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कोविड ने छीना सहारा: कॉपी-किताब छोड़ मजदूरी करने लगे मासूम, बिखर गए शिक्षक बनने के सपने

Sun, 16 Jan 2022 11:04 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: शाहरुख खान Updated Sun, 16 Jan 2022 11:04 AM IST
सार

कोरोना की वजह से कई मासूमों के सिर से मां का आंचल हट गया तो अनेक बच्चों ने पिता को खो दिया। अनेक बच्चे ऐसे भी हैं, जिन्होंने माता-पिता दोनों को खो दिया। सरकारें ऐसे मासूमों की मदद के लिए आगे आईं इसके बावजूद वे मजदूरी करने, कपड़ा ढोने, कतरन समेटने और किसी फुटपाथ पर गुलाब बेचने को मजबूर हैं।

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Coronavirus In Delhi Covid snatched support Innocent people left copy-book and started working as a laborer,
कपड़ा उद्योग में काम करते बाल श्रमिक - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कॉपी-किताब छोड़कर मासूमों के मजूदर बनने के पीछे मजबूरियां पहले भी कम नहीं थी, कोविड ने इसे और बढ़ा दिया। कोरोना की दूसरी लहर में दिल्ली के लगभग हर गली-मोहल्ले में मौतें हुईं। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार, जिनके घरों का चूल्हा पति-पत्नी या दोनों की दिन भर की मेहनत से जलता था, कोरोना के कारण मंद हो गया क्योंकि कई घरों में कमाने वाले ही नहीं बचे।
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कई मासूमों के सिर से मां का आंचल हट गया तो अनेक बच्चों ने पिता को खो दिया। अनेक बच्चे ऐसे भी हैं, जिन्होंने माता-पिता दोनों को खो दिया। सरकारें ऐसे मासूमों की मदद के लिए आगे आईं इसके बावजूद वे मजदूरी करने, कपड़ा ढोने, कतरन समेटने और किसी फुटपाथ पर गुलाब बेचने को मजबूर हैं। दिहाड़ी करने वाले परिवार जिनकी आय लॉकडाउन व अन्य बंदिशें लगने से कम हुई हैं, उनके बच्चे भी पिता का सहारा बनने के लिए मजदूरी की डगर पर निकल पड़े हैं। पेश है प्रगति मिश्रा की रिपोर्ट...
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बिखर गए शिक्षक बनने के सपने
15 साल की खुशी (बदला हुआ नाम) को स्कूल जाना बेहद पसंद है, लेकिन अब उनके बड़े-बड़े सपने वास्तविकता के धरातल से टकराकर बिखर चुके हैं। खुशी बताती हैं कि मम्मी-पापा से जिद करके पढ़ाई जारी रखने का मौका मिला था, लेकिन कोविड के बाद से स्कूल ज्यादा समय खुले ही नहीं। ऑनलाइन पढ़ाई के लिए स्मार्ट फोन चहिए। घर में एक ही फोन है जो भाई को तो पढ़ने के लिए मिल जाता है मुझे नहीं देते। पहले टीचर बनना चाहती थी अब सोच रही हूं कि घर में सिलाई के काम में ज्यादा वक्त हाथ बटाने लगूं। बाकी भाई-बहन करते हीं हैं थोड़े पैसे आएंगे तो घरवालों को मदद मिलेगी।
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कोई ना जाने गुलाब के कांटों की चुभन
14 साल के अखिल (बदला नाम) हर दिन सुबह करीब 9 बजे मेट्रो स्टेशन पहुंच जाते हैं और दिनभर गुलाब बेचना उनका रोज का काम है। अखिल बताते हैं कि वह पहले सरकारी स्कूल जाते थे। पापा मजदूरी करते थे मां घरों में साफ सफाई के लिए जाती थी तो घर खर्च चलता था। कोविड में पापा बीमार हुए और चल बसे। मां का काम भी कई घरों में छूट गया छोटे भाई और मेरे खाने का इंतजाम मुश्किल से होता था तो मैं पढ़ाई के लिए कैसे सोचता। यहां गुलाब बेचकर थोड़े पैसे मिलते हैं तो दोनों वक्त का खाना हो जाता है।
 

कोशिशें जारी हैं, लेकिन हालात सुधर नहीं रहे

बालश्रम समाज की बड़ी समस्या बन चुका है। बात दिल्ली की करें तो यहां स्लम एरिया खासकर संकरी गलियों में रहने वाली आबादी में ज्यादा बाल श्रमिक हैं। दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन चाइल्ड राइट्स ने अप्रैल 2021 के पहले हफ्ते में अपनी हेल्पलाइन 9311551393 लांच की। सिर्फ अप्रैल से जून के बीच ही इस पर 4500 शिकायतें आई। इनमें 2200 शिकायतें ऐसी थी, जिनमें तत्काल मदद जरूरी थी। सरकारी एवं निजी संस्थाओं द्वारा समय-समय पर किए गए सर्वे इस बात की गवाही देते हैं कि बाल श्रम का एक बड़ा हिस्सा गैरकानूनी कारखानों, व्यवसायों एवं गंभीर रिस्क वाले क्षेत्रों से भी जुड़ा है।

बढ़ रही मासूमों से जुड़ी शिकायतें
दिल्ली बाल संरक्षण आयोग के पास बाल श्रम एवं बाल अधिकारों के हनन संबंधी आने वाली शिकायतों का ग्राफ कोविड के बाद तेजी से बढ़ा है। विभाग को 2015 में 664 शिकायतें मिली और 580 का निस्तारण हुअ, वहीं 2016-17 में यह आंकड़ा घटकर 547 रह गया था, जिसमें से 494 का निस्तारण हुआ। वर्ष 2017-18 में शिकायतों की संख्या 626 थी, जिनमें से 410 का निस्तारण किया गया। 2018-19 में यह आंकड़ा 741 पर पहुंचा, जिनमें से 540 का समाधान हुआ। लेकिन 2019-20 में विभाग को 1315 शिकायतें मिलीं, जिनमें से 718 का हल निकला। वर्ष 2020-21 में शिकायतों की संख्या बढ़कर 6668 हो गई। जिनमें से 2542 का निस्तारण हुआ।

दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग की रिपोर्ट
कोविड महामारी में बच्चों को लेकर यूनिसेफ ने वैश्विक परिवेश में अपनी कई रिपोर्ट जारी की हैं। इसमें ऐसे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई से लेकर इनके पोषण तक पर संकट बताए गए हैं। दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग की रिपोर्ट अनुसार दिल्ली में करीब 2043 बच्चों ने कोविड से माता-पिता में से एक को खोया है। इनमें से 67 से अधिक ने माता-पिता दोनों खोए, वहीं 1300 से अधिक बच्चों के सिर से पिता का साया चला गया।

'सेव द चिल्ड्रन' के दिल्ली स्टेट ऑफिस में सीनियर मैनेजर मिंटू देवनाथ ने कहा कि कोविड ने बाल श्रमिकों को एक रोजगार से दूसरे की ओर जाने के लिए विवश किया है, जो चिंताजन है। दिल्ली में कपड़ा उद्योग से बड़ी संख्या में बाल श्रमिक लंबे समय से जुड़े थे, लेकिन कोविड काल में कई छोटे उद्यमियों ने काम बंद कर दिया, जिससे ये बेरोजगार होकर दूसरे कामों से जुड़ रहे हैं जो ज्याद खतरनाक हो सकते हैं। बड़ी संख्या में कोविड से अनाथ हुए बच्चे बाल श्रम की ओर बढ़ रहे हैं। हमने कोविड से अनाथ हए 300 बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए काम शुरू किया है, लेकिन इससे कहीं अधिक जरूरतमंदों की संख्या है जिसे बाल श्रम की ओर बढ़ने से रोकने के लिए कदम उठाए जाना जरूरी है।
 
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