फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Conservation of Quwwat-ul-Islam Mosque on the lines of Taj Mahal

Delhi News: ताजमहल की तर्ज पर कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का संरक्षण

Fri, 23 Jun 2023 07:00 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Fri, 23 Jun 2023 07:00 PM IST
विज्ञापन
Conservation of Quwwat-ul-Islam Mosque on the lines of Taj Mahal
सन 1197 में कुतुब मीनार परिसर में बनी मस्जिद के संरक्षण में कार्बनिंग तकनीक का किया जा रहा इस्तेमाल
विज्ञापन

मकराना के पत्थर का इस्तेमाल किया जा रहा है, राजस्थान के धौलपुर और आगरा के कारीगर कर रहे हैं काम



आशीष सिंह

नई दिल्ली। कुतुब मीनार के परिसर में स्थित कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का ताजमहल की तर्ज पर संरक्षण किया जा रहा है। पहली बार कार्बनिंग तकनीक की मदद से इसके तोरणद्वार को ठीक किया जा रहा है। इसके खराब हुए पत्थर निकालकर उसके स्थान पर नए पत्थर लगाए जा रहे हैं। समय के साथ व भूकंप, रखरखाव के अभाव में मस्जिद में आई दरारों को भरा जा रहा है। इसमें लाइटिंग की व्यवस्था भी की जाएगी, जिससे यह दूर से ही लोगों को आकर्षित करेगी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की ओर से इसका संरक्षण किया जा रहा है।


एएसआई के अधिकारियों ने कहा है कि जिस तरह ताजमहल का संरक्षण कार्बनिंग के जरिये होता है, उसी शैली का इसमें प्रयोग किया जा रहा है। जी- 20 शिखर सम्मेलन को देखते हुए इसका काम एक महीने के भीतर पूरा करने की उम्मीद है। राजस्थान के धौलपुर व आगरा के 35 कारीगर संरक्षण का कार्य कर रहे हैं। इसमें मकराना के पत्थर का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें कार्बनिंग का कार्य कर रहे रफीक चौधरी व रहमान बताते हैं कि यह काफी मुश्किल तकनीक है। पहले पत्थर की कार्बनिंग की जाती है, उसके बाद दूसरे पत्थर पर उसे उकेरा जाता है। यह थोड़ा अधिक समय लेता है। कुतुब मीनार से कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, अलाई दरवाजा और लौह स्तंभ को जोड़ने वाली जगह पर रैंप बनाए जा रहे हैं। कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद जाने वाले रास्ते पर रैंप तैयार भी हो चुका है।
विज्ञापन




सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक ने कराया था निर्माण


इस मस्जिद का निर्माण सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक ने सन 1193 से 1197 के बीच करवाया था। कुव्वत-उल-इस्लाम के नाम से यह प्राचीन मस्जिद प्रसिद्ध है। इसके चारों ओर दालान बने हुए हैं। माना जाता है कि इसमें प्रयुक्त खंभे व अन्य वस्तुएं हिंदू व जैन मंदिर को ध्वस्त कर प्राप्त की गई थीं। इसके बाद के शासकों ने भी इस मस्जिद का विस्तार करवाया था। शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने सन 1211-36 और अलाउद्दीन खिलजी ने सन 1296-1316 में मस्जिद में कुछ हिस्से जोड़े थे। इस मस्जिद को हिंदू और इस्लामिक कला के तहत बनाया गया था। मस्जिद के अंदर ही एक लौह स्तंभ है, जिस पर गुप्तकाल की लिपि में संस्कृत में लेख लिखा है।
विज्ञापन
विज्ञापन




सबसे प्राचीन मस्जिदों में शामिल



कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद को दिल्ली की सबसे पुरानी मस्जिदों में माना जाता है। यह मस्जिद 121 फीट लंबे और 150 फीट चौड़े चबूतरे पर स्थित है। मस्जिद के परिसर में एक छोटा मकबरा भी है। इसे सिकंदर लोदी के शासन काल में बनवाया गया था। माना जाता है कि जमीम इमाम का मकबरा है, जो इस मस्जिद में नमाज पढ़ते थे।




मस्जिद के आर्च का संरक्षण कार्य लगभग कार्य पूरा हो गया है। कई जगहों से आर्क में दरारें विकसित हो गई थीं। इसके सरंक्षण करने के लिए लंबे समय से प्रक्रिया चल रही थी। इसके संरक्षण के बाद परिसर में मौजूद अन्य स्मारकों का भी संरक्षण किया जाएगा। आने वाले दिनों में यह लोगों को आकर्षित करेगी।

-प्रवीण सिंह, दिल्ली सर्कल चीफ व सुपरिटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट, एएसआई

ये है कार्बनिंग तकनीक



कार्बनिंग तकनीक का मतलब कार्बन को इस्तेमाल कर उसे पत्थर पर लगाया जाता है और फिर उसको एक कागज में उतार लिया जाता है। इसके बाद उसे जस का तस जिस पत्थर में उकेरना है उस पर लगाया जाता है। जब वह पत्थर पर अपनी छाप छोड़ देता है, उसके बाद कारीगर पत्थर को आकार देते हैं। इससे पुराने पत्थर का आकार और डिजाइन एक समान ही रहते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed