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प्रदूषण लोगों को बना रहा स्ट्रोक का मरीज
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प्रदूषण लोगों को बना रहा स्ट्रोक का मरीज
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- धूम्रपान करने वाली महिलाओं को गर्भवस्था के दौरान होती है अधिक परेशानी
माई सिटी रिपोर्टर
गाजियाबाद। कोरोना वायरस महामारी के चलते लगाए गए लॉकडाउन के दौरान देश भर में प्रदूषण का स्तर न के बराबर हो गया था। आस-पास के इलाके में हवा सांस लेने लायक़ हो गई थी, लेकिन अब दोबारा आबो- हवा खराब होने के साथ ही जिला प्रदूषण के मामले में देश में दूसरे-तीसरे स्थान पर पहुंच रहा है। लोगों को स्ट्रोक के प्रति जागरूक करने के लिए 29 अक्टूबर को वर्ल्ड स्ट्रोक डे के रूप में मनाया जाता है।
प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से स्ट्रोक होने की संभावना कई गुना अधिक बढ़ जाती है। स्ट्रोक तब होता है जब मस्तिष्क के एक हिस्से में खून का बहाव बंद हो जाता है, या फिर एक नलीका के फटने से मस्तिष्क में खून भर जाता है, जिसे हेमोरहेजिक स्ट्रोक भी कहा जाता है। पिछले एक दशक में स्ट्रोक के मामले काफी बढ़ गए हैं। इससे पहले स्ट्रोक से पीड़ित मरीज की उम्र 60-70 के बीच की होती थी, लेकिन आजकल 40 और उससे कम उम्र के लोगों में स्ट्रोक का खतरा बढ़ रहा है।
प्रदूषण के कारण हो जाता है ब्रेन स्ट्रोक
वायु प्रदूषकों में ऐसे कण शामिल होते हैं जिनका आकार काफी छोटा होता है। ये छोटे कण संवहनी प्रणाली (वस्कुलर सिस्टम) में प्रवेश कर जाते हैं। उन लोगों में स्ट्रोक का खतरा ज़्यादा पैदा करते हैं, जो पहले से ही इस बीमारी की चपेट में हैं। रिसर्च में ये भी पाया गया है कि प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से छोटे कण आपके दिमाग के अंदर की परत को भी नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे स्ट्रोक हो जाता है।
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यह बन रहे कारण
ये धूम्रपान, शारीरिक गतिविधि की कमी और उच्च रक्तचाप की अंदेखी करने से इसका खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा गलत खानपान के कारण भी स्ट्रोक के मामले बढ़ जाते हैं।
लक्षण
स्ट्रोक होने पर अचानक संतुलन खोना, एक या दोनों आंख से न दिखना, चेहरा लटक जाना और धीमे या फिर बोलने में दिक्कत आना जैसे लक्षण नजर आते हैं जिससे इस बीमारी को पहचाना जा सकता है।
स्ट्रोक होते ही इन पर दें ध्यान
न्यूरो फिजीशियन डा. राकेश कुमार का कहना है कि अगर स्ट्रोक आने के कुछ घंटों में ही मरीज का इलाज हो जाए तो वह बिल्कुल ठीक या फिर काफी हद तक ठीक हो सकता है। इंजेक्शन के ज़रिए ब्लड क्लॉट को हटा दिया जाता है, लेकिन ये सिर्फ साढ़े चार घंटे के अंदर ही संभव है। अगर 6 घंटे हो गए हैं तो इसे एंजियोग्राफी के जरिए निकाल दिया जाता है। ज्यादा देर होने पर मरीज को बचाना मुश्किल हो जाता है।
कोलंबिया एशिया अस्पताल की वरिष्ठ महिला रोग विशेषज्ञ डा. रंजना बेकन का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में स्ट्रोक ज्यादा होने की संभावना रहती है। गर्भवस्था और पहले से ही मौजूद हाई ब्लड प्रेशर या गैस्टेशनल हाइपरटेंशन महिलाओं में स्ट्रोक होने की संभावना को बढ़ा सकता है। जो महिलाएं धूम्रपान करती हैं या शराब पीती हैं उनमें इसका खतरा उन महिलाओं के मुकाबले ज्यादा होता है जिनके अंदर किसी भी तरह की नशे की प्रवृत्ति नहीं होती है।
इस तरह से करें बचाव
- प्रदूषण होने पर घर से सुबह निकलने से बचें।
- अगर निकलना पड़े तो खाली पेट न निकलें। मास्क जरूर लगाएं।
- दिन में एक बार कमरे में पोछा जरूर लगाएं। अगर संभव हो तो रूम के दरवाजे या खिड़की के आसपास पानी से गीला करके कपड़ा लगाएं।
- कमरे में तौलिया या कोई भी कपड़ा गीला करके चारों तरफ घुमाएं, इससे प्रदूषण का कण गीले कपड़े में चिपक जाता है।
- नियमित योग करें। शारीरिक श्रम करने से फेफड़ों के सांस लेने की क्षमता बढ़ जाती है, इससे प्रदूषण का असर कम होता है।
- कोलेस्ट्राल न बढ़नें दें, इसके लिए तली-भुनी चीजों का प्रयोग कम से कम करें।
- पेट में गैस बनने पर भी ब्लड प्रेशर बढ़ेगा, इसलिए गैस न बनने पाए और खानपान में ध्यान दें।
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आशुतोष यादव
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