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आपकी आंखे दिखाएंगी दुनिया...
देहरादून/रजा शास्त्री
Updated Sun, 28 Jul 2013 12:53 PM IST
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नेत्रदान कितना महान कार्य है, इसकी बानगी सहारनपुर के इस रोगी से देखिये। इसने पूरे चार साल नेत्रहीन का जीवन गुजारा है। आंखों में संक्रमण के बाद कार्नियल अंधता हो गई। कार्निया ट्रांसप्लांट के बाद रोगी की जिंदगी बदल गई।
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एक साल पहले तक यह रोगी दो लोगों के कांधे के सहारे हिमालयन इंस्टीट्यूट जौलीग्रांट अस्पताल के नेत्र रोग विभाग में आया था। सहारनपुर से अकेले चेक अप के लिए आते हैं।
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कुछ नियम कायदे की वजह से हम इस रोगी का नाम पता नहीं छाप रहे हैं। लेकिन इस रोगी की पूरी कहानी हम आपको बताएंगे। मकसद लोगों को सिर्फ नेत्रदान की अहमियत बताना है। एक इंसान की अंधेरी जिंदगी किस तरह रोशन हो जाती है।
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हिमालयन इंस्टीट्यूट के नेत्र रोग विभाग की आई बैंक प्रभारी डा. नीती गुप्ता बताती हैं कि सहारनपुर के इस रोगी की दोनों आंखों में रोशनी नहीं थी। आंखों में संक्रमण से अल्सर बना और फिर कार्निया खराब हो गई। रोगी इलाज के लिए कई जगह भटका।
एक साल पहले अस्पताल आया। जांच के बाद कार्निया ट्रांसप्लांट हुई। पट्टी हटी, आंख में रोशनी की किरण फूट पड़ी। 60 साल की उम्र में भी रोगी की जिंदगी सामान्य है। डा. गुप्ता बताती हैं कि चेक अप के लिए रोगी अकेले अस्पताल आ जाता है।
सहारनपुर के इस रोगी की कहानी तो हमने आपको बतौर बानगी सुनाई है। इस तरह के 14 रोगी और हैं जिनकी आंखों की रोशनी बिल्कुल चली गई थी। लेकिन नेत्रदानियों की बदौलत आज सब कुछ अपनी आंखों से देख सकते हैं। नेत्रदानी खुद तो दुनिया से रुखसत हुए लेकिन दूसरों को आबाद कर गए।
आप भी कर सकतें हैं नेत्रदान
जो रोगी कार्नियल अंधता से पीड़ित हैं और कार्निया ट्रांसप्लांट कराना चाहते हैं, वे ओपीडी में आकर चेक-अप कराएं। इसके बाद ब्लड बैंक में रजिस्ट्रेशन करा लें। कार्निया मिलने पर जांच के बाद ट्रांसप्लांट हो जाएगा।
अगर कोई व्यक्ति अपने परिजन के देहांत के बाद नेत्रदान करता है तो वह जौलीग्रांट अस्पताल के आई बैंक प्रभारी को फौरन फोन कर दे। आई बैंक की टीम उसके घर आकर पार्थिव शरीर से नेत्र सुरक्षित कर लेगी।
जौलीग्रांट अस्पताल के नेत्र रोग विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आरसी नागपाल ने बताया कि कार्नियल अंधता से पीड़ित 45 रोगी अभी लाइन में हैं। कार्निया मिलते ही ट्रांसप्लांट कर दिया जाएगा। अस्पताल में अत्याधुनिक उपकरण और तकनीक उपलब्ध है।