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Dehradun News: महिला उद्यमियों ने बताई सफलता के पीछे की कहानी
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स्वावलंबी भारत अभियान के तहत दून विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम के तीसरे दिन बृहस्पतिवार को महिला उद्यमियों ने अपनी सफलता के पीछे की कहानी बताई। इस मौके पर उन्हें सम्मानित भी किया गया। देर शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम में स्कूल-कॉलेज के छात्रों ने नृत्य और गायन की प्रस्तुति से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। शुक्रवार को कार्यक्रम का समापन होगा।
कार्यक्रम में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. गीता खन्ना ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उन्होंने कहा कि भिक्षावृत्ति एक गंभीर समस्या है। यह अच्छे सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के बावजूद आधुनिक समाजिक जीवन में बनी हुई है। दून भी इस खराब स्वरूप से अछूता नहीं है। कहा कि व्यवस्थित डाटा और शोध अध्ययनों की कमी के कारण, शहर में भीख मांगने वालों की संख्या का आकलन करना मुश्किल है। इससे राज्य में भिखारियों के पुनर्वास के लिए आजीविका का वैकल्पिक मार्ग बनाना एक बड़ी चुनौती है।
वहीं, विवि की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने भिखारियों के लिए डेटा संग्रह, विश्लेषण और नीतिगत निहितार्थों के महत्व पर जोर दिया। विवि के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के डीन प्रो. राजेंद्र ममगाईं ने कार्यशाला का उद्देश्य बताते हुए तर्क दिया कि भिक्षावृत्ति में लिप्त अधिकांश लोग दूसरे राज्यों से हैं। ऐसी स्थिति में पुनर्वास उपाय करना अव्यावहारिक है। कार्यशाला में हर्ष डोभाल, डॉ. सुशांत कुमार, डॉ. अंगसुमन सरमा, हर्षिता प्रजापति, डॉ. नरेश मिश्रा, आदित्य नेगी आदि मौजूद रहे।
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इन्होंने किया प्रतिभाग
कार्यशाला में राज्य सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग, मानव तस्करी रोधी पुलिस, समाज कल्याण विभाग, राज्य बाल संरक्षण समिति के अधिकारी और बचपन बचाओ आंदोलन, आसरा ट्रस्ट, माहिला मोर्चा, भुबनेश्वरी महिला आश्रम जैसे नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रतिभाग किया।
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कार्यक्रम में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. गीता खन्ना ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उन्होंने कहा कि भिक्षावृत्ति एक गंभीर समस्या है। यह अच्छे सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के बावजूद आधुनिक समाजिक जीवन में बनी हुई है। दून भी इस खराब स्वरूप से अछूता नहीं है। कहा कि व्यवस्थित डाटा और शोध अध्ययनों की कमी के कारण, शहर में भीख मांगने वालों की संख्या का आकलन करना मुश्किल है। इससे राज्य में भिखारियों के पुनर्वास के लिए आजीविका का वैकल्पिक मार्ग बनाना एक बड़ी चुनौती है।
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वहीं, विवि की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने भिखारियों के लिए डेटा संग्रह, विश्लेषण और नीतिगत निहितार्थों के महत्व पर जोर दिया। विवि के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के डीन प्रो. राजेंद्र ममगाईं ने कार्यशाला का उद्देश्य बताते हुए तर्क दिया कि भिक्षावृत्ति में लिप्त अधिकांश लोग दूसरे राज्यों से हैं। ऐसी स्थिति में पुनर्वास उपाय करना अव्यावहारिक है। कार्यशाला में हर्ष डोभाल, डॉ. सुशांत कुमार, डॉ. अंगसुमन सरमा, हर्षिता प्रजापति, डॉ. नरेश मिश्रा, आदित्य नेगी आदि मौजूद रहे।
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इन्होंने किया प्रतिभाग
कार्यशाला में राज्य सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग, मानव तस्करी रोधी पुलिस, समाज कल्याण विभाग, राज्य बाल संरक्षण समिति के अधिकारी और बचपन बचाओ आंदोलन, आसरा ट्रस्ट, माहिला मोर्चा, भुबनेश्वरी महिला आश्रम जैसे नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रतिभाग किया।