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विवाद: चारधाम यात्रा में 'बदरीधाम' बनने की लड़ाई

Fri, 21 Nov 2014 04:30 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, जोशीमठ (चमोली)
ब्यूरो / अमर उजाला, जोशीमठ (चमोली) Updated Fri, 21 Nov 2014 04:30 PM IST
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winter char dham yatra in uttarakhand.

बदरीनाथ धाम के कपाट 27 नवंबर को बंद हो रहे हैं। कपाट बंद होने के बाद भी इस बार यात्रा जारी रहेगी।

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तय हुआ है कि शीतकाल के छह महीने श्रद्धालु पांडुकेश्वर जाकर बदरीधाम की यात्रा का पुण्य कमाएंगे। लेकिन इस पर विवाद खड़ा हो गया है। जोशीमठ स्थित श्री देवपुजाई समिति ने पांडुकेश्वर में शीतकालीन पूजा-अर्चना और यात्रा का विरोध किया है।

दरअसल, शीतकाल में भी बदरीनाथ की मूर्ति तो धाम में ही रहती है। लेकिन उनके प्रतिनिधि के रूप में उद्धव जी पांडुकेश्वर के योग ध्यान बदरी मंदिर में निवास करते हैं। दूसरी ओर आदि शंकराचार्य की गद्दी, भोग मंडी व बदरीनाथ के रावल शीतकाल के छह माह जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर में प्रवास करते हैं।

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जोशीमठ में हो बदरीनाथ की शीतकालीन पूजा

winter char dham yatra in uttarakhand.

श्री देवपुजाई समिति का कहना है कि जोशीमठ में ही बदरीनाथ की शीतकालीन पूजा और यात्रा हो। समिति का कहना है कि प्रदेश सरकार शास्त्रों के विपरीत बदरीनाथ की शीतकालीन पूजा पांडुकेश्वर में संपन्न कराने जा रही है।

देवपुजाई समिति के पदाधिकारी शुक्रवार को एसडीएम, जोशीमठ का घेराव करेंगे। समिति के सचिव अनिल नंबूरी ने कहा कि यदि बदरीनाथ की शीतकालीन पूजा नृसिंह मंदिर में संपन्न कराने का शासनादेश जारी नहीं किया गया तो समिति न्यायालय की शरण में जाएगी।

जनता आंदोलन करेगी। उधर, पांडुकेश्वर में बदरीनाथ के हक-हकूकधारियों का कहना है कि आदिकाल से ही शीतकाल में बदरीनाथ की पूजा पांडुकेश्वर में होती आई है। धार्मिक परंपराओं के मामले में विवाद ठीक नहीं है।

पहले भी हो चुका है विवाद

winter char dham yatra in uttarakhand.

बदरीनाथ धाम की शीतकालीन पूजा को लेकर पहले भी विवाद हो चुका है। प्रदेश में भाजपा के शासनकाल के दौरान वर्ष 2010-11 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और चारधाम विकास परिषद के अध्यक्ष सूरत राम नौटियाल की पहल पर शीतकालीन चारधाम यात्रा शुरू की गई।

उस दौरान भी बदरीनाथ का शीतकालीन पूजा स्थल पांडुकेश्वर ही बताया गया था। जब यात्रा से संबंधित बैनर लगे वाहन जोशीमठ पहुंचे तो यहां स्थानीय लोगों ने बैनर फाड़कर पांडुकेश्वर में बदरीनाथ की शीतकालीन पूजा का विरोध किया था।

मामले को बढ़ता देख बदरीनाथ की शीतकालीन यात्रा कुछ ही दिन चल पाई थी। तब मामला शांत हो पाया था।

आदिकाल से चली आ रही है परंपरा

बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति में तीन बार सदस्य रह चुके वयोवृद्ध कुशलानंद सती का कहना है कि बदरीनाथ की मूर्ति तो एक जगह अटल है। उद्धव जी की मूर्ति शीतकाल में पांडुकेश्वर रहती है।

माणा गांव में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले माता मूर्ति मेले में भी बदरीनाथ के प्रतिनिधि के रुप में उद्धव जी की विग्रह मूर्ति जाती है। लेकिन बदरीनाथ की पूजा नृसिंह मंदिर में होती है। यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है।

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हक-हकूकधारियों के अलग-अलग मत

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भगवान बदरीनाथ की शीतकालीन पूजा को लेकर हक-हकूकधारियों के अलग-अलग मत हैं। एक मत यह है कि बदरीनाथ से तिब्बत नजदीक होने के कारण हूणों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए बदरीनाथ की धार्मिक परंपराएं प्रभावित होने लगीं और सनातन धर्म के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा।

सनातन धर्मावलंबियों ने भगवान बदरीशाल की स्वयंभू मूर्ति को नारद कुंड में डाल दिया, ताकि कोई मूर्ति को क्षति न पहुंचा सके। आठवीं सदी में आदि गुरु शंकराचार्य का ज्योर्तिमठ, जोशीमठ आगमन हुआ।

उन्होंने यहां पर कल्पवृक्ष के नीचे तप किया और उन्हें ज्ञान ज्योति की प्राप्ति हुई। आदि गुरु शंकराचार्य इसी दौरान बदरीधाम पहुंचे और उन्होंने नारद कुंड से भगवान बदरीनाथ की पत्थर शिला मूर्ति को निकालकर फिर से पुनर्स्थापित किया।

तब से भगवान बदरी विशाल की पूजा एवं परंपराओं का पालन किया जा रहा है। आज भी आदि गुरु शंकराचार्य जी की गद्दी और बदरीनाथ की शीतकाल में छह माह की पूजाएं जोशीमठ नृसिंह मंदिर में होती है।

भगवान बदरीनाथ के प्रतिनिधि के रूप में उद्धव जी शीतकाल में बदरीश पंचायत से पांडुकेश्वर योग ध्यान बदरी मंदिर में निवास करते हैं। इसे देखते हुए आदिकाल से ही शीतकाल में बदरीनाथ की पूजा पांडुकेश्वर में संपन्न होती आयी है। धार्मिक परंपराओं के मामले में विवाद तर्कसंगत नहीं है।
- जगदीश मेहता और जयदीप मेहता, पांडुकेश्वर में बदरीनाथ के हक-हकूकधारी

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