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बांधों के बाद पतली हो गई गंगा की जलधारा
रजा शास्त्री / अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 13 Feb 2016 03:56 PM IST
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उत्तरकाशी, चमोली, टिहरी समेत गंगा बेसिन में जहां भी बांध बने हैं, वहां गंगा की जलधारा पतली हो गई है।
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इस वजह से हरिद्वार समेत बेसिन के ‘लोअर’ हिस्से के अधिकांश घाटों पर पानी नहीं पहुंच पा रहा है। शासन ने विज्ञानियों के सुझाव के मुताबिक अर्द्धकुंभ के दौरान टिहरी झील को ‘बफर रिजरवॉयर’ के रूप में भी इस्तेमाल नहीं किया है। गंगा बेसिन में काम कर रहे विज्ञानियों ने शासन को सुझाव दिया था कि लीन सीजन यानी जाड़ा और गर्मी में गंगा की जलधारा को अविरल बनाए रखने के लिए बांध जितना पानी लेते हैं, उसका 40 फीसदी छोड़ते रहें।
गंगा बेसिन में भूमि की उर्वरकता और सेडीमेंट्स डिपोजिट पर शोध कर रहे वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के विज्ञानियों ने जाड़े और गर्मी के लीन सीजन में गंगा की अविरल जलधारा के खंडित हो जाने के प्रति आगाह किया था। विज्ञानियों ने पाया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और नियमावली के मुताबिक बांधों में लिए जाने वाले पानी का निश्चित भाग जलधारा में नहीं छोड़ा जा रहा है।
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इससे उत्तरकाशी में भिलंगना, टिहरी और श्रीनगर के आसपास के बांधों के बाद जलधारा बहुत पतली हो गई है। कुछ स्थानों पर रेत-बजरी के नीचे सिर्फ पानी का रिसाव पाया गया। इस संबंध में भारतीय वन्य जीव संस्थान, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी ने भी आगाह किया था। गंगा एक्शन प्लान में भी इस संबंध में निर्देश दिए गए हैं।
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वाडिया के विज्ञानियों की रिपोर्ट के संबंध में 28 जनवरी को शासन स्तर पर हुई ‘रिवर मार्फोलॉजी एनालिसिस एंड डिजाइन’ बैठक में लीन सीजन में हरिद्वार के अर्द्धकुंभ के मद्देनजर सलाह दी गई थी कि टिहरी झील को बफर रिजरवॉयर बनाने के साथ बांधों में ऊपरी जलधारा से लिए जाने वाले 40 फीसदी पानी को छोड़ा जाए। रिपोर्ट में कहा जाए कि गंगा में ‘मिनिमम इकोलॉजिकल फ्लो’ बनाए रखा जाए।
बेसिन के ऊपरी हिस्से में ग्लेशियरों का पानी आने से गंगा का बहाव बना रहता है। बांधों के बाद से गंगा की जलधारा पतली हो जाती है। नियम भी हैं और इस संबंध में सुझाव भी दिए गए कि टिहरी झील को बफर रिजरवॉयर बनाया जाए, जिससे अर्द्धकुंभ के दौरान घाटों पर पर्याप्त पानी रहे।
- डॉ. संतोष राय, वरिष्ठ विज्ञानी, वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान