यहां 50 प्रतिशत मतदाता भी नहीं करते मतदान
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पर्वतीय प्रदेश उत्तराखंड में पर्वतीय जिलों के आधे से ज्यादा मतदाताओं को इस बात से कोई मतलब नहीं कि उनका प्रतिनिधि कौन बन रहा है।
हालत यह है कि 50 प्रतिशत मतदाता ही तय कर दे रहे हैं कि संसद में उनके क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कौन करेगा। मतदाताओं का बूथ की ओर रुख करने में टिहरी संसदीय क्षेत्र का रिकार्ड सबसे अधिक खराब है।
सिर्फ एक बार मतदान प्रतिशत 50 से ऊपर
पिछले 40 साल में इस सीट पर सिर्फ एक बार मतदान प्रतिशत 50 से ऊपर रहा है। प्रदेश की पांचों सीटों में सबसे कम मतप्रतिशत हासलि करने का रिकार्ड भी इसी सीट के नाम रहा है।
टिहरी संसदीय क्षेत्र में 1996 के चुनाव में भाजपा के मानवेंद्र शाह ने कांग्रेस के नवप्रभात के खिलाफ जीत हासिल की थी। पर हार जीत का यह फैसला मात्र 24 प्रतिशत वोटों के आधार पर हो गया था।
1989 के चुनाव में कांग्रेस के ब्रहमदत्त और निर्दलीय चुनाव लड़े इंद्रमणि बडोनी के बीच की टक्कर के दौरान यहां का मतदान प्रतिशत 50 से ऊपर पहुंच पाया था।
गढ़वाल सीट का रिकार्ड कुछ बेहतर
गढ़वाल सीट का रिकार्ड टिहरी से कुछ बेहतर है। पर यहां भी पिछले 40 साल में सिर्फ एक ही मौका ऐसा है जब मतदान प्रतिशत 50 से ऊपर पहुंचा।
1984 के चुनाव में मुकाबला चंद्र मोहन सिंह और लोकदल के भारत सिंह केबीच हुआ था। उस समय इस सीट पर मतदान 52 प्रतिशत से अधिक हुआ था।
गनीमत यह रही कि इस सीट पर मतदान प्रतिशत 45 प्रतिशत से कम नही रहा। पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी की इस पसंदीदा सीट से हेमवती नंदन बहुगुणा ने 1980 में चुनाव लड़ा था पर उस समय भी कुल मतप्रतिशत 46 पर आकर अटक गया था।
अल्मोड़ा के हाल और भी बुरे
उत्तराखंड की तीसरी पर्वतीय सीट अल्मोड़ा के हाल और भी बुरे रहे। इस सीट पर मतप्रतिशत कभी 50 प्रतिशत से ऊपर गया ही नहीं।
देश की उन गिनी चुनी सीटों में से उत्तराखंड की एक मात्र यही सीट है जिसपर 2009 में हार जीत का फैसला महज डेढ़ प्रतिशत वोटों के अंतर से तय हो गया था।
हरीश रावत ने भी आजमाया हाथ
हरीश रावत, बची सिंह रावत की इस पसंदीदा सीट पर मुरली मनोहर जोशी ने भी भाग्य आजमाया था पर उस समय भी मतप्रतिशत मात्र 44 तक ही सीमित रह गया था।
2004 को अपवाद मान लिया जाए तो नैनीताल सीट पर कभी मतदान प्रतिशत 50 से कम रहा ही नहीं। पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी की इस पसंदीदा सीट पर हर बार मतदाताओं ने खसी रुची दिखाई।
हरिद्वार पर भी मंडरा रहा है संकट
दूसरी ओर हरिद्वार ही प्रदेश की एक मात्र ऐसी सीट है जिसपर मतदान प्रतिशत कभी 50 से कम रहा ही नहीं। हरिद्वार में 1977 केचुनाव में करीब 64 प्रतिशत मतदाताओं ने हिस्सा लिया था।
पिछले कुछ सालों का ट्रेंड बता रहा है कि हरिद्वार में भी हालात बहुत बेहतर नहीं है। 1964 में 64 प्रतिशत मतदान करने वाला हरिद्वार अब साठ के क्लब को छोड़कर 50 के क्लब की ओर बढ़ रहा है।
2004 और इससे पहले के चुनाव में तो हरिद्वार साठ प्रतिशत का आंकड़ा छू ही नहीं पाया है।
जरूरी नहीं बड़े नेता खींच ही लें वोट
यह भी साफ है कि सिर्फ एक कद्दावर नेता के मैदान में होने पर भी मतदाता बूथ की ओर रुख करने में खास दिलचस्पी नहीं दिखाते।
आंकड़ों से यह भी जाहिर हो रहा है कि मैदान में बड़े नेता के होने के बाद भी मतदान प्रतिशत बढ़ ही जाए यह तय नहीं होता। यह जरूर है कि दो दिग्गजों की टक्कर में मतदान प्रतिशत में इजाफा तो हो ही जाता है।
इन सीटों पर यह रही थी स्थिति
साल - टिहरी - गढ़वाल - अल्मोड़ा - नैनीताल - हरिद्वार
2004 - 43.44 - 46.54 - 49.89 - 48.87 - 53.19
1999 - 42.24 - 46.41 - 41.82 - 58.76 - 56.90
1998 - 44.83 - 51.25 - 46.45 - 57.04 - 61.57
1996 - 24.01 - 43.63 - 43.38 - 59.19 - 53.24
1991 - 47.97 - 46.51 - 40.12 - 52.10 - 60.04
1989 - 50.83 - 49.26 - 43.81 - 52.94 - 56.74
1984 - 49.48 - 52.81 - 46.51 - 64.04 - 64.79
1980 - 40.18 - 46.7 - 39.68 - 51.68 - 65.08
1977 - 46.19 - 47.55 - 43.82 - 60.45 - 65.56