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विनोद बड़थ्वालः उत्तराखंड में मुलायम के समाजवाद का आखिरी मुगल

Wed, 13 Apr 2016 03:30 AM IST
गौरव मिश्रा/अमर उजाला, देहरादून
गौरव मिश्रा/अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 13 Apr 2016 03:30 AM IST
सार

  • सांस में बसती थी तो सिर्फ और सिर्फ राजनीति 
  • वैचारिक तौर पर धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, कल्याणकारी राज्यवादी थे विनोद 

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vinod badthwal, mulayam's socialist mughal of uttarakhand.
विनोद बड़थ्वाल को आखिरी विदाई देने सभी पार्टी के नेता पहुंचे थे। - फोटो : AmarUjala

विस्तार

जैसा नाम वैसा स्वभाव। विनोद बड़थ्वाल बेहद खुशमिजाज, हंसमुख, जिंदादिल, पराक्रमी और विनोदी स्वभाव के इंसान थे। जीवन तूफानों से गुजरते और भारी संघर्ष में बिताया। सब्र, साहस और साकारात्मक सोच की वजह से वह भीतर से कभी नहीं टूटे। इन गुणों के ही बदौलत वह झोपड़ी से केंद्रीय राजनीति तक पहुंच पाए। जन्मजात नेता थे इसी लिए कभी भी नौकरशाह बनने की सोची तक नहीं।
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कक्षा छह से उनके मित्र-साथी रहे ओएनजीसी अधिकारी अशोक चंदन बताते हैं कि गांधी इंटर कॉलेज में पठन पाठन के दौरान वह छात्रों के मुद्दे पर भिड़ते जूझते थे।
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उनके मित्र, सखा व संघर्ष के साथी रहे सुभाष शर्मा, सूर्यकांत धस्माना, सुनील अग्रवाल, योगेंद्र लखेड़ा बताते हैं कि अभूतपूर्व संघर्ष का रास्ता अख्तियार कर युवा व छात्र राजनीति के शिखर पुरुष बन गए। उनके नाम का डंका लखनऊ व दिल्ली तक बजने लगा। छात्र व युवा राजनीति के दौरान कई मर्तबा जेल गए। अपराध जगत के लोगों से सीधी टक्कर ली। आंदोलनों व अभियानों के बदौलत देहली तक रॉबिनहुड सरीखी छवि बन गई।
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गोलियां झेली फिर भी जूझते रहे अपराध जगत से

vinod badthwal, mulayam's socialist mughal of uttarakhand.
विनोद बड़थ्वाल को आखिरी विदाई - फोटो : AmarUjala

उनके नाम से भ्रष्ट अफसर थर्राते थे। अपराधियों से जूझते हुए दो भाई राजेश व कैलाश मारे गए। 1988 में विनोद पर भी गोलियों से हमला हुआ। पांच गोलियां शरीर में बिध गई। लेकिन फिर भी अपराध जगत से जूझना नहीं छोड़ा। 

प्रदेश अध्यक्ष डॉ. एसएन सचान  कहते हैं कि 1989 में उत्तरप्रदेश में जनता दल सरकार बनी तो मुलायम ने इन्हें सूबेदार सरीखी ताकत प्रदान की। शासन प्रशासन में रुतबा बढ़ा। उत्तरप्रदेश निर्यात निगम के चेयरमैन बन गए। जनता दल से अलग होने पर जनता पार्टी सुब्रामण्यम स्वामी की अध्यक्षता वाली जनता पार्टी का हिस्सा बने। लेकिन विनोद हमेशा मुलायम सिंह को अलग पार्टी बनाने का निवेदन करते थे।

देहरादून में ही समाजवादी पार्टी बनाने की योजना परवान चढ़ी। योजनाकारों में जनेश्वर मिश्रा, विनोद बड़थ्वाल, राजेेंद्र चौधरी, रमाशंकर कौशिक, सुभाष शर्मा, सूर्यकांत धस्माना व वह खुद ( एसएन सचान) प्रमुख थे।

सपा में ही ली अंतिम सांस

vinod badthwal, mulayam's socialist mughal of uttarakhand.
विनोद बड़थ्वाल को आखिरी विदाई देने पहुंचे नेता। - फोटो : AmarUjala

उनके साथी रहे ठाकुर संजय सिंह चौहान व फुरकान अहमद कुरैशी व आरिफ हुसैन वारसी याद करते हैं कि मुलायम सिंह तत्कालीन उत्तरप्रदेश के गढ़वाल-कुमाऊं में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते थे। रमाशंकर कौशिक व विनोद बड़थ्वाल की अलग अलग कमेटियां गठित कर दी। बड़थ्वाल कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया गया।

बड़थ्वाल ने एक साल तक समूचे पहाड़ में क्रांति रथ चलाया। देहरादून के रामतीर्थ मिशन आश्रम में सात दिनों तक अभूतपूर्व प्रशिक्षण शिविर चला। सैंकड़ों लोगों ने हिस्सा लिया। बुद्धिजीवी, राजनेता शामिल हुए। 1993 में सपा बसपा सरकार बनी। मुलायम सिंह ने बड़थ्वाल को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया।

वरिष्ठ पत्रकार आरपी नैलवाल व हरवीर कुशवाहा का कहना है कि उत्तराखंड आंदोलन में दो अक्तूबर 1994 की शर्मनाक घटना से सपा उत्तराखंड में अछूत की तरह हो गई। उनको भाजपा व कांग्रेस से बड़े-बड़े ऑफर मिले। लेकिन उन्होंने सब को ठुकरा दिया। 1994 से लेकर अंतिम सांस तक सपा में ही रहे। पार्टी के मुख्य शख्सियतों में से एक थे। लेकिन जनता द्वारा कभी भी चुने नहीं गए। इसका गम उन्हें हमेशा रहा। मुज्जफरनगर कांड ने उन्हें उत्तराखंड के मानस में अस्वीकार्य बना दिया।

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