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पेट्रोल-डीजल पर वैट बढ़ाने की तैयारी में उत्तराखंड सरकार

Tue, 21 Jul 2015 02:47 PM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 21 Jul 2015 02:47 PM IST
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vat on petrol diesel will increase in uttarakhand.

उत्तराखंड गठन के बाद से प्रदेश की सरकारों जनता के साथ दोहरा खेल कर रही है। सदन में कर रहित बजट और बाद में टैक्स का बोझ। एक बार फिर राज्य सरकार पेट्रोल और डीजल पर वैट बढ़ाने की तैयारी कर पुरानी कहानी दुहराने की कोशिश में लगी है।

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प्रदेश में कर की वृद्धि दर बता रही है कि राजस्व के मामले में उत्तराखंड महफूज है पर गैर योजनागत खर्च को कम करने में नाकाम सरकार आम आदमी पर टैक्स का बोझ बढ़ाकर अपनी इस नाकामी को छुपाने की कोशिश में है।
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पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के समय से ही प्रदेश में कर रहित बजट की परंपरा रही है। बजट में कर लगाने का मतलब है, उस पर बहस, आम आदमी की स्क्रीनिंग से गुजरना और विपक्ष का हल्ला सहना। लिहाजा बजट में कोई कर नहीं। यह सरकार का एक चेहरा है।
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वहीं बजट सत्र के बाहर प्रदेश मंत्रिमंडल ऐसे फैसले लेने से नहीं चूकता जो आम आदमी का खर्च बढ़ा दे। प्रदेश सरकार कह सकती है कि आखिरकार वित्तीय मामलों को सदन के पटल पर रखा जाता है। पर तब बहस, चर्चा की गुंजाइश ही कहां बचती है।

लिहाजा मंत्रिमंडल एक के बाद एक टैक्स रेशनलाइजेशन (तर्कसंगत बनाने) के नाम पर कर का बोझ बढ़ाने से बाज नहीं आ रहा है। पूर्ववर्ती सरकार का भी यही हाल रहा है। जड़ी बूटी को कर मुक्त श्रेणी से हटा दिया गया और किसी ने उफ तक नहीं की। नदियों के जल के उपयोग पर कर लगाने का फैसला पहले ही केबिनेट कर चुकी है।

अब पेट्रोल और डीजल पर वैट बढ़ाने की तैयारी है और यह फैसला भी सभी राज्यों में एक समान दर के नाम पर लिया जा रहा है। साफ है कि इस बार की मंत्रिमंडल की बैठक में उजले कर रहित बजट का स्याह चेहरा सामने होगा।

कर वृद्धि दर में लगातार कमी से बढ़ा दबाव
अब हालात बदल गए हैं। कें द्रीय सहायता में करीब 2500 करोड़ की कटौती के बाद सरकार पर कर राजस्व बढ़ाने का दबाव है। पिछले कुछ सालों की कर राजस्व वृद्धि दर बता रही है कि इसमें कमी आई है। ऐसे में कर स्रोत के नए संसाधन खोजना प्रदेश सरकार की मजबूरी बन गई है।

वित्त विभाग का अनुमान है कि 2015-16 में केंद्रीय सरकार से सहायता अनुमान में 3646 करोड़ रुपए की कमी आएगी। सरप्लस बजट की परंपरा को निभाने की कोशिश में 14वें वित्त आयोग से मिलने वाला घाटा प्रतिपूर्ति अनुदान भी प्रदेश को नहीं मिल पाया। हिमाचल को यह मिला। ऐसे में सरकार अब माथा पीट रही है।

वेतन में ही खप जा रहा है राजस्व
सरकार का स्वयं का कर राजस्व 29.11 प्रतिशत है। वेतन, भत्ते, मजदूरी पर खर्च 31 प्रतिशत। पेंशन पर खर्च हो रहा है 8 प्रतिशत। लिहाजा वृहत निर्माण कार्य के लिए बचे केवल 13 प्रतिशत।


यह रही पिछले कुछ सालों में कर की वृद्धि दर

2014-15 - 5453.44 (करोड़ में) - 11.88
2013-14 - 4874.39 - 14.14
2012-13 - 4270.72 - 17.46

मंत्रिमंडल के फैसले से लगाए गए टैक्स
एक प्रतिशत मंडी शुल्क -22 फरवरी,2014
सभी प्रकार के उप खनिजों पर दर 13.5 प्रतिशत - नवंबर, 2014
डीजल की बिक्री पर रिबेट समाप्त -10 नवंबर 2014
रेत, बजरी, नदी तल उपखनिज पर नौ प्रतिशत टैक्स -10 नवंबर, 2014
चीनी पर 2.5 प्रतिशत प्रवेश कर -14 अगस्त, 2014
जड़ी, बूटी, संगध पादप आदि को कर मुक्त श्रेणी से हटाया -29 अक्टूबर, 2009

ऐसा नहीं है कि टैक्स सिर्फ बढ़ाए ही गए हैं। इस तरह की कोई मंशा भी नहीं है। टैक्स समाधान किया गया। कई छूट भी दी जा रही है। यह लगातार जारी रहने वाला मंथन है। आसपास के राज्यों और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए टैक्स को रेशनलाइज करना होता है। यह जरूर है कि अब परिस्थितियां कठिन हो गई हैं। केंद्र ने राज्य का विशेष दर्जा समाप्त ही कर दिया है। ऐसे में अभी तो किसी तरह से काम चल रहा है। पर आगे दबाव बढ़ेगा। पर हम चुप नहीं बैठे हैं। केंद्र से लगातार बात जारी है।
- इंदिरा हृदयेश, वित्त मंत्री

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