उत्तराखंड में 14 साल से नहीं चली उम्मीदों की रेल
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केंद्र और सूबे में सत्ताधारी दल को बंपर वोटों से नवाजने वाली उत्तराखंड की जनता की भावनाओं से हमेशा खेल ही होता रहा।
स्थापना के बाद 14 साल के अरसे में कभी भी उम्मीदों की रेल नहीं चल पाई। आलम यह है कि यूपीए सरकार में घोषित ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन निर्माण कब शुरू होगा, इस पहेली का हल न राज्य में सत्ता पर काबिज कांग्रेस के पास है, न ही भाजपा के पांचों सांसदों के पास जिनका आज केंद्र में राज है।
रेल मंत्री की घोषणा के बाद हरिद्वार मुजफ्फरनगर के बीच सीधे रेलमार्ग के मामले में एक कदम भी बढ़त नहीं मिली। राज्य गठन के बाद 2004 में पहला लोकसभा चुनाव हुआ तो राज्य की पांच लोकसभा सीटों में से एक एक कांग्रेस व सपा और तीन भाजपा को मिली।
केंद्र में यूपीए सरकार सत्तासीन हुई, पांच साल गुजरे और हाथ कुछ नहीं लगा। 2009 के लोकसभा चुनाव में जनता ने पांचों सांसद कांग्रेस की झोली में डाल दिए और केंद्र में पुन: कांग्रेस सत्तासीन हुई। मगर, हैरतअंगेज बात यह रही कि पांच सांसद जितवाने के बावजूद राज्य को आधी इंच नई रेल लाइन तक मयस्सर नहीं हुई।
इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा
2014 का लोकसभा चुनाव हुआ तो जनता ने लोकसभा की पांचों सीट भाजपा की झोली में डाल दी। भाजपाई पिछले वर्ष के बजट से यह कहकर बच सकते हैं कि केंद्र में भाजपा की सरकार नई थी। लेकिन इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा।
पृष्ठभूमि यह बताने के लिए काफी है कि राज्य की जनता ने केंद्र को दिल खोलकर सांसद दिए, लेकिन सरकारें इस छोटे पर्वतीय राज्य की भावनाओं से खेलती रही। इसलिए जनता के पास इंतजार करने के अलावा कुछ नहीं है। हालांकि इस बार भाजपा के सांसदों ने अपनी अपनी तैयारी की है। लेकिन देखना यही है कि इस बार क्या मिलता है।
हरिद्वार से यदि सड़क मार्ग से मुजफ्फरनगर जाना है तो 92 किमी की दूरी तय करनी है। लेकिन यदि रेलमार्ग से जाना है तो यह दूरी बढ़कर 130 किमी हो जाती है।
क्योंकि हरिद्वार से रेलमार्ग से मुजफ्फरनगर जाने के लिए लक्सर, रुड़की, सहारनपुर, देवबंद होकर जाना होता है। हरिद्वार से मुजफ्फरनगर सीधी रेल लाइन की घोषणा पतंजलि योगपीठ केउद्घाटन के वक्त तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने की थी, लेकिन हुआ कुछ नहीं।
इस बार यदि नैनीताल सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने रेलमंत्रालय को अपना प्रस्ताव सौंपा है। वर्तमान में हरिद्वार से हल्द्वानी मुरादाबाद होकर जाना पड़ता है। उनका प्रस्ताव मंजूर हुआ तो धामपुर से काशीपुर, गदरपुर को जोड़ते हुए रेलमार्ग बनेगा और लंबाई में 70 किलोमीटर कटौती होगी।
भूमिगत हैं उत्तराखंड के रेल पुरुष
खुद को रेल पुरुष कहलवाकर सतपाल महाराज खूब इतराते रहे। लेकिन अब रेल बजट के मौके पर भूमिगत हैं। अब तो वह भाजपा में भी हैं, लेकिन ना रेलमंत्री से मुलाकात, ना प्रधानमंत्री से कोई मांग।
हां, देहरादून में किसी प्रोजेक्ट के सर्वे शुरू करने केलिए उनके नाम के लगे पत्थर जरूर देखे जा सकते हैं। लेकिन एक बार रेल राज्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने राज्य को क्या दिया, इस सवाल का जवाब तलाशने की जरूरत है।
रेल मंत्रालय में इस क्षेत्र का माई-बाप नहीं रहा
केंद्रीय सियासत में रेलमंत्रालय पर हर सियासी दल लार टपकाता रहा है। गठबंधन की राजनीति की मजबूरी के चलते सत्ताधारी दल को भी कम ही यह मंत्रालय मिल पाया है। जिन दलों के रेलमंत्री बने, सबने अपने राज्य और हलके की रेल चलाई।
रेलमंत्री रहीं ममता बनर्जी पर तो कोलकाता से ही रेल मंत्रालय चलाने का इल्जाम था। सी के जाफर शरीफ, लालू प्रसाद दव, राम विलास पासवान जैसे पूर्व रेलमंत्रियों पर क्षेत्रीय हितों को साधने के आरोप लगते रहे। रेलमंत्रालय में इस क्षेत्र की कोई दमदार सियासी पैरवी न होना भी रेलमैप से उत्तराखंड के हाशिये पर होने की वजह रही।
पहले पुराने अधूरे प्रोजेक्ट्स पर बात करूंगा। कर्णप्रयाग रेल लाइन के लिए अभी तक भूमि अधिग्रहण भी नहीं हुआ। ऐसे ही कई और काम है जो शुरू होने से पहले खत्म होते नजर आ रहे हैं।
- बीसी खंडूड़ी, सांसद पौड़ी गढ़वाल