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Uttarakhand News : विलुप्त हो रहीं जड़ी बूटियों की 85 प्रजातियों के संरक्षण में जुटे वैज्ञानिक

Mon, 11 Jan 2021 03:22 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Mon, 11 Jan 2021 03:22 PM IST
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uttarakhand news :  Scientists engaged in conservation of extinct herbs 85 species
85 जड़ी बूटियों के संरक्षण में जुट गए विज्ञानी

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के वनस्पति विज्ञानी उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों के साथ ही देश के तमाम हिमालयी राज्यों और मैदानी राज्यों में पाई जाने वाली औषधीय प्रजातियों की 85 जड़ी बूटियों के संरक्षण में जुट गए हैं। औषधीय जड़ी बूटियों को संरक्षित किया जा सके, इसके लिए वनस्पति विज्ञानियों की ओर से भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण संस्थान में धनवंतरी वाटिका भी तैयार की गई है।

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वरिष्ठ वनस्पति विज्ञानी और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के क्षेत्रीय प्रभारी डॉ. एसके सिंह के मुताबिक पिलखन, चित्रक, शतावरी, अंजीर, काली मूसली, चंदन, सर्पगंधा समेत ऐसी प्रजातियां चिह्नित की गई हैं जो हिमालयी राज्यों के साथ ही मैदानी राज्यों में पायी जाती हैं। लेकिन, इन जड़ी बूटियों के अत्यधिक दोहन के चलते ये न सिर्फ तेजी से कम हो रही हैं वरन कई प्रजातियों के विलुप्त होने का भी खतरा मंडरा रहा है।
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इन प्रजातियों के संरक्षण के लिए केंद्रीय वन, पर्यावरण जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की पहल पर कार्यक्रम चलाया जा रहा है। योजना के पहले चरण में पिलखन, चित्रक,, शतावरी, काली मूसली, अंजीर चंदन, सर्पगंधा समितियों की औषधीय जड़ी-बूटियों को सूचित किया जा रहा है। संरक्षित औषधीय जड़ी बूटियों में कई ऐसी हैं जिन्हें उतर पूर्वी राज्यों मेघालय, असम, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों से लाया गया हैं, जबकि कई प्रजातियां ऐसी हैं जो जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के विभिन्न इलाकों से लाकर उनका संरक्षण किया जा रहा है।
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वरिष्ठ वनस्पति विज्ञानी डॉ. एस के सिंह के मुताबिक फिलहाल पहले चरण में 85 प्रजातियों को संरक्षित किया जा रहा है, जबकि अगले चरण में कई अन्य जातियों को चिह्नित कर उनका संरक्षण किया जाएगा।

अष्टवर्ग प्रजाति की जड़ी-बूटियां विलुप्त होने का खतरा

अष्टवर्ग प्रजातियों की आठ जड़ी-बूटियों रिद्धि, वृद्धि, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा काकोली और छीरकाकोली के विलुप्त होने का खतरा खड़ा हो गया है। वनस्पति विज्ञानियों के अनुसार काकोली और छीरकाकोली जैसी जड़ी-बूटियां विलुप्त हो गई हैं। ऋषभक और जीवक जैसी जड़ी-बूटियों के विलुप्त होने का खतरा है। इन जड़ी-बूटियों के संरक्षण को लेकर वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक आगे आए हैं।


बता दें, रिद्धि, बृद्धि, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली और छीरकाकोली जैसी अष्टकवर्ग प्रजातियों की जड़ी-बूटियों का च्यवनप्राश बनाने में इस्तेमाल होता है। चरक संहिता में भी इन जड़ी-बूटियों का उल्लेख है। अत्यधिक दोहन और संरक्षण न किए जाने के चलते ये जड़ी-बूटियां तेजी से विलुप्त हो रही हैं।

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