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उत्तराखंड संस्कृति यात्राः 103वें साल में पहुंची डिम्मर की रामलीला, 12वीं शताब्दी में बसा था यह गांव

Sun, 28 Mar 2021 12:47 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सतीश गैरोला, अमर उजाला, कर्णप्रयाग
सतीश गैरोला, अमर उजाला, कर्णप्रयाग Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sun, 28 Mar 2021 12:47 PM IST
सार

  • 12वीं शताब्दी में बसा था यह गांव, तब वाल्मीकि रामायण का होता था पाठ

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uttarakhand news: Dimmer village Ramlila reached 103rd year
पौराणिक रामलीला का आगाज हो गया - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

श्री बदरीनाथ धाम के डिमरी पुजारियों के गांव डिम्मर में बुधवार 24 मार्च से पौराणिक रामलीला का आगाज हो गया है। पहले दिन श्री राम जन्मोत्सव का मंचन किया गया। 1918 से शुरू हुई यह रामलीला अपने गौरवमयी इतिहास के 103वें साल में प्रवेश कर चुकी है। डिम्मर गांव 12वीं शताब्दी में बसा था और तब भी भगवान बदरीविशाल के कपाट खुलने से पहले यहां पर वाल्मीकि रामायण का पाठ विधि-विधान से किया जाता था। 

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डिम्मर की रामलीला इस मायने में भी खास मानी जाती है कि हर वर्ष धार्मिक विधि-विधान के साथ यह रामलीला होली के दौरान ही शुरू होती है। रामलीला में गाए जाने वाली राग, छंद, दोहे, चौपाई और राधेश्याम को एक जनरल के रूप में संजोकर रखा गया है। गांव के विद्वान आचार्य रामलीला शुरू होने से पहले इस पवित्र पुस्तक की पूजा करते हैं।
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भगवान बदरीविशाल के कपाट खुलने की तिथि तय किए जाने के अवसर पर वसंत पंचमी के दिन ही डिम्मर गांव के गांव के बड़े व बुजुर्ग चौंरीचौक में बैठकर रामलीला की तिथि पंचांग पढ़कर निर्धारित करते हैं।

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इनका रहा योगदान

डिमरी धार्मिक पंचायत के अध्यक्ष आशुतोष डिमरी कहते हैं कि डिम्मर गांव की रामलीला का संबंध बदरीनाथ धाम से जुड़ा है। और यही वजह है कि यह आयोजन होली के दौरान होता है। बदरीनाथ भगवान विष्णु का धाम है और त्रेता युग में भगवान राम ही विष्णु के अवतार हुए। 

कहा जाता है कि आठवीं सदी में जब आदिगुरु शंकराचार्य बदरीनाथ के प्रवास पर जा रहे थे तो उन्होंने डिम्मर गांव में एक स्थान को संध्या और वंदन के लिए चुना था, आज इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया है। तब संध्या के लिए उन्होंने मंदिर के नीचे कुंड से जल लिया था। यह कुंड आज भी यहां मौजूद है। कितना भी सूखा पड़ जाय, कुंड का पानी कभी कम नहीं होता। गांव की रामलीला भी इसी स्थान पर हो रही है।
 
आशुतोष डिमरी बताते हैं कि वर्ष 1918 में रामलीला की शुरूआत कराने में गांव के स्व. ज्ञानानंद डिमरी, धर्मानंद डिमरी, चक्रधर डिमरी, पीतांबर डिमरी, द्वारिका प्रसाद डिमरी आदि का अहम योगदान रहा था। उसके बाद 70 के दशक से रामलीला की शताब्दी तक स्व. कांता प्रसाद डिमरी के रावण के अभिनय ने छाप छोड़ी। गांव के उमा प्रसाद डिमरी, मोहन प्रसाद डिमरी आदि बुजुर्ग आज भी पूरे मनोयोग से रामलीला में पात्रों का उत्साहवर्धन करते आ रहे हैं।

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