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उत्तराखंड : स्नो एवलांच, ग्लेशियर टूटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी के लिए फिलहाल कोई तंत्र नहीं

Mon, 26 Apr 2021 10:29 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Mon, 26 Apr 2021 10:29 AM IST
सार

पहले चमोली में ही नीती घाटी और अब भारत-चीन सीमा पर सुमना-2 इलाके में हिमस्खलन की घटनाओं ने एक बार फिर  यह साबित कर दिया है।

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uttarakhand news : Currently there is no mechanism to monitor natural disasters
उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्नो एवलांच - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्नो एवलांच, ग्लेशियर टूटने और भारी-भरकम चट्टानों के दरकने से आने वाली भयावह प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी को लेकर सरकार, शासन के साथ ही तमाम वैज्ञानिक संस्थानों के पास कोई पुख्ता निगरानी तंत्र नहीं है। पहले चमोली में ही नीती घाटी और अब भारत-चीन सीमा पर सुमना-2 इलाके में हिमस्खलन की घटनाओं ने एक बार फिर  यह साबित कर दिया है।

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रेन्डोल्फ़ ग्लेशियर इन्वेंटरी के आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में कुल 1573 छोटे बड़े ग्लेशियर हैं। जो 2258 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं। लेकिन, इन 1573 ग्लेशियरों में से सिर्फ चुनिंदा 10 ग्लेशियरों की ही निगरानी वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों द्वारा जा रही है।
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इनमें गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ स्थित चौराबाड़ी, जोशीमठ स्थित दूणागिरी, उत्तरकाशी स्थित ढोकरियानी समेत कुल 10 ग्लेशियरों की ही निगरानी को लेकर वाडिया इंस्टीट्यूट की ओर से ऑल वेदर मॉनिटरिंग स्टेशन लगाए गए। लेकिन, चमोली के नीती घाटी और भारत तिब्बत चीन सीमा पर सुमना इलाके में स्थित ग्लेशियरों और हिमस्खलनों की निगरानी के लिए कोई तंत्र वाडिया इंस्टीट्यूट के पास नहीं है। यही वजह है कि इन प्राकृतिक आपदाओं के आने की कोई सटीक जानकारी वैज्ञानिकों को नहीं मिल पा रही है।

वसुधरा ताल की मॉनिटरिंग का मामला भी अधर में

नीती घाटी में ही वसुधरा ताल का जलस्तर साल दर साल तेजी से बढ़ रहा है। जो किसी भी दिन बड़ी आपदा के रूप में तब्दील हो सकता है। इसी के मद्देनजर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की ओर से एक प्रस्ताव सरकार को भेजा गया था। इसमें बजट मुहैया कराने के साथ ही आल वेदर मॉनिटरिंग को लेकर अत्याधुनिक उपकरण लगाए जाने की बात कही गई थी।

वाडिया इंस्टीट्यूट की ओर से विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज भी दिया गया। लेकिन, मामला ठंडे बस्ते में चला गया। स्थिति तब है जबकि राज्य सरकार की ओर से ही वाडिया इंस्टीट्यूट से अनुरोध किया गया था कि वसुधरा ताल की मॉनिटरिंग को लेकर कोई निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।

पर्याप्त बजट न मिलने से शोधों में आ रही दिक्कत

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों की मानें तो डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (डीएसटी) की ओर से भी पर्याप्त बजट नहीं मिलने से वैज्ञानिक शोधों में दिक्कतें आ रही हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट में ग्लेशियरों के अध्ययन को लेकर एक केंद्र स्थापित किया गया था।

पहले तो डीएसटी ने इस केंद्र के लिए बजट जारी किया। बजट मिलने के साथ ही तमाम वैज्ञानिक शोध भी किए गए। लेकिन, फिलहाल डीएसटी ने केंद्र के लिए बजट देना बंद कर दिया है। ऐसे में अब वाडिया इंस्टीट्यूट की ओर से ही केंद्र को अपने संसाधनों से संचालित करना पड़ रहा है।

उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जिस तरीके से स्नो एवलांच, ग्लेशियरों के टूटने और भारी-भरकम चट्टानों के दरकने से प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं, उसे देखते हुए अधिक से अधिक स्थानों पर ऑल वेदर मॉनिटरिंग स्टेशन स्थापित किए जाने की जरूरत है। इसके लिए डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के साथ ही राज्य सरकार को पहल करनी होगी। संस्थान के वैज्ञानिकों की ओर से ऐसी प्राथमिक आपदाओं की मॉनिटरिंग निगरानी को लेकर मॉनिटरिंग स्टेशन स्थापित करने के साथ ही हर तकनीकी सहयोग दिया जाएगा।
- डॉ. कालाचांद साईं, निदेशक, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी

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