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हाईकोर्ट ने निरस्त की मुजफ्फरनगर कांड के दस्तावेजों से संबंधित याचिका, कहा यूपी में दर्ज कराएं केस

Mon, 03 Dec 2018 10:05 PM IST
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, नैनीताल
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, नैनीताल Updated Mon, 03 Dec 2018 10:05 PM IST
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Uttarakhand high court reject Muzaffarnagar Firing case petition 
court

उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ ने राज्य आंदोलन के दौरान 1994 में हुए मुजफ्फरनगर कांड से संबंधित केस उत्तर प्रदेश में दर्ज कराने का आदेश दिया है।

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प्रदेश सरकार ने भी कोर्ट में शपथपत्र पेश कर कहा है कि प्रदेश सरकार मुजफ्फरनगर के पीड़ितों को मुआवजा और पेंशन दे रही है। अगर कोई पीड़ित छूट गया है तो वह उत्तर प्रदेश के सामने अपना पक्ष रखे। उत्तराखंड 1994 में उत्तर प्रदेश से अलग नहीं हुआ था और इस घटना का न्यायिक क्षेत्र उत्तर प्रदेश ही है। कोर्ट ने इसी के साथ यह याचिका निस्तारित कर दी है।
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सोमवार को हुई सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने कहा कि यह मामला उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से जुड़ा हुआ है इसलिए केस उत्तर प्रदेश में दर्ज किए जाएं। पूर्व में हाईकोर्ट ने मुजफ्फरनगर कांड के पीड़ितों को न्याय न मिलने के मामले का खुद ही संज्ञान लेकर उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह को पक्षकार बनाया था और पूछा था कि मुजफ्फरनगर कांड में जिम्मेदार पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई और तमाम अदालतों में मुजफ्फरनगर कांड से संबंधित मुकदमों की स्थिति क्या है।

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कोर्ट ने कहा था कि मुकदमों की रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाए। सुनवाई में कोर्ट ने पाया कि उत्तर प्रदेश की ओर से कोई जवाब नहीं आया। कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को भी शपथपत्र पेश कर जवाब देने को कहा था। 

एक समाचार पत्र में छपी आरोपियों को अभी तक सजा न मिल पाने की खबर का संज्ञान लेकर हाईकोर्ट ने इन री इन द मैटर ऑफ डिमांड ऑफ जस्टिस फॉर प्रो स्टेटहुड प्यूपिल के नाम से जनहित याचिका दर्ज की थी।  याचिका में कहा गया कि 1994 में एक अक्तूबर की देर रात अलग राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश पर मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर रोक लिया गया था।

इससे आंदोलनकारी नाराज हुए तो पुलिस ने आंदोलनकारियों पर फायरिंग की। इस फायरिंग में दर्जन भर पुरुष और महिला आंदोलनकारियों की मौत हो गई थी और कई घायल हो गए। कुछ महिला आंदोलनकारियों के साथ दुष्कर्म की भी बात भी सामने आई थी। अधिकतर आरोपी अदालतों से बरी हो चुके हैं। यहां तक कि इनकी फाइलें भी न्यायालयों से गायब हो चुकीं हैं।

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