हजारों साल पुरानी रॉक पेंटिंग बर्बादी की कगार पर
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उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के कुछ स्थानों पर हजारों साल पहले आदि मानव द्वारा चट्टानों में उकेरे गए शैल चित्र (रॉक पेंटिंग) बर्बादी की कगार पर हैं।
इनमें पेटशाल के निकट लखुडियार के शैल चित्रों को राज्य पुरातत्व विभाग ने 1992 में संरक्षण पर ले लिया, लेकिन ल्वेथाप, फलसीमा, फड़कानौली, कसारदेवी और कफ्फरकोट की कुछ चट्टानों पर बने शैल चित्र संरक्षण में नहीं लिए गए। ये बरबाद होने की स्थिति में हैं।
अल्मोड़ा से 14 किमी दूर लखुडियार में सुआल नदी के किनारे स्थित चट्टान के आठ मीटर लंबे और छह मीटर ऊंचे हिस्से में अनेक शैल चित्र बने हैं। ये शैल चित्र प्रागैतिहासिक काल के माने जाते हैं। इन चित्रों में नृत्य मुद्रा में मानव आकृतियां बनी हुई हैं।
इन आकृतियों के अलावा ज्यामितीय डिजाइन, बिंदु समूह, सर्पीलीकार रेखाएं, पेड़ों जैसी आकृतियां और पशु आदि के चित्र भी बने हैं। इसी तरह अल्मोड़ा-ताकुला मोटर मार्ग में डीनापानी से करीब तीन किमी दूर ल्वेथाप में भी शैल चित्र मौजूद हैं।
यहां उकेरी गई कुछ आकृतियां लखुडियार से हटकर हैं। इनके अलावा अल्मोड़ा के निकट फलसीमा, कसारदेवी, फड़कानौली और कफ्फरकोट में भी शैलाश्रय हैं।
काली मंदिर के पास की रॉक पेंटिंग हुई नष्ट
लखुडियार के अलावा अन्य स्थानों के शैलाश्रयों के बारे में स्थानीय लोगों को भी जानकारी नहीं है। यदि पुरातत्व विभाग ने शीघ्र योजना नहीं बनाई तो ये सदा के लिए विलुप्त हो सकते हैं।
अल्मोड़ा तहसील के फलसीमा में काली मंदिर के निकट एक चट्टान पर बने शैलचित्र पिछले कुछ सालों में पूरी तरह नष्ट हो गए। पुरातत्वविद कौशल किशोर सक्सेना ने बताया कि दो दशक पहले तक यह शैलाश्रय वहां मौजूद थे, लेकिन इन्हें भी संरक्षित नहीं किया गया। हाल के वर्षों में पत्थर के धंधेबाजों ने इस चट्टान को नुकसान पहुंचाकर यह शैलाश्रय भी नष्ट कर दिए।
ल्वेथाप की चट्टान में बने शैल चित्रों को संरक्षित करने का प्रस्ताव मंजूर हो चुका है। इस शैल चित्र को शीघ्र संरक्षित किया जाएगा। इसके अलावा अन्य जगहों पर मौजूद शैल चित्रों के संरक्षण के प्रस्ताव फिलहाल नहीं भेजे गए हैं लेकिन संबंधित क्षेत्रों के ग्राम प्रधानों को पत्र लिखकर इन शैल चित्रों के बचाव का आग्रह किया गया है।
- डॉ. सीएस चौहान, प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी