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उत्तराखंडः फॉरेस्ट एक्ट नहीं सरकार बनी 'जीवन रेखा' की राह का रोड़ा

Fri, 15 Jul 2016 10:40 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 15 Jul 2016 10:40 AM IST
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uttarakhand government become hurdle in making roads
रोड - फोटो : Demo Pic

वन भूमि हस्तांतरण के अभाव में उत्तराखंड के कई गांव आज भी सड़क से महरूम हैं। सड़कों के अलावा कई प्रोजेक्ट भी लटके पड़े हैं।

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इसके लिए वन संरक्षण अधिनियम को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि अधिनियम से ज्यादा राज्य सरकार, संबंधित विभागों के अधिकारियों की लापरवाही और एक-दूसरे पर दोषारोपण की प्रवृत्ति जिम्मेदार है।
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इस अधिनियम के तहत राज्य सरकार को कई अधिकार दिए गए हैं, लेकिन जनहित में सरकार इनका प्रयोग  करती नजर नहीं आ रही है। हालात यह हैं कि पिछले वित्तीय वर्ष में करीब 176 और इस वित्तीय वर्ष में अब तक 165 प्रोजेक्ट अटके हुए हैं।
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इसी का नतीजा है कि सड़कों से महरूम गांवों की जनता का धैर्य अब जवाब देने लगा है। मंगलवार को उत्तरकाशी के सरबडियार क्षेत्र की घटना इसकी नजीर है।

इस क्षेत्र के आठ गांवों के लोगों ने खुद आरा, कुल्हाड़ी उठाकर 700 से अधिक हरे पेड़ों का सफाया कर दिया। सरकार और संबंधित विभाग भले ही वन संरक्षण अधिनियम को रोना रोते हैं, लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट है। इस कानून के तहत उत्तराखंड को कई विशेष छूट दी गई हैं।

विभागों में अटकी पड़ी हैं मंत्रालय से आने वाली फाइलें

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फाइल - फोटो : Getty

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के देहरादून स्थित क्षेत्रीय कार्यालय को लीनियर प्रोजेक्ट (सड़क, रेलवे, ट्रांसमिशन, इरिगेशन) में असीमित और नॉन लीनियर प्रोजेक्ट (अस्पताल, होटल, स्कूल, टूरिज्म प्रोजेक्ट आदि) में 40 हेक्टेयर तक के अधिकार मिले हुए हैं।

सड़क से वंचित उत्तरकाशी के सरबडियार जैसे क्षेत्रों में सड़क निर्माण जैसे लीनियर प्रोजेक्ट्स के लिए मंत्रालय और अधिनियम के बजाय राज्य सरकार के विभाग ज्यादा जिम्मेदार हैं। विभागों में लंबे समय तक मंत्रालय से आने वाली फाइलें अटकी पड़ी हैं।

मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक ऐसे तमाम प्रोजेक्ट पर लोक निर्माण विभाग कुंडली मारकर बैठा हुआ है जो कि जनहित में जरूरी है। कार्यालय के अधिकारी अजय कुमार ने बताया कि जनता से जुड़े सड़क आदि के तमाम प्रोजेक्ट में या तो जनता के दबाव में या फिर नेताओं के दबाव में पीडब्ल्यूडी कदम नहीं बढ़ाता है। 

किसी भी प्रोजेक्ट को रीजनल कार्यालय से एप्रूव होने में अधिकतम 150 दिन और अधिकारियों को फाइल एप्रूव करने में अधिकतम 25 दिन का समय लगता है। हमारे स्तर पर सभी फाइलें समय से निपटाई जा रही हैं लेकिन लोक निर्माण विभाग में एक से दो साल तक फाइल लटकी पड़ी रहती है।
- अजय कुमार, अपर प्रमुख मुख्य वन संरक्षक, क्षेत्रीय कार्यालय

कई बार प्रस्ताव पर जब मंत्रालय से क्वैरी आती है तो बजट आदि के प्रावधान करने की वजह से कुछ विलंब हो जाता है लेकिन यह इतनी लंबी देरी नहीं होती है।
- दिनेश अग्रवाल, वन मंत्री

मंत्रालय का यह कहना गलत है कि हमारा विभाग देरी करता है। बहुत सारे प्रस्ताव वन विभाग के पास लंबित पड़े हुए हैं। - एचके उप्रेती, विभागाध्यक्ष एवं प्रमुख अभियंता, लोक निर्माण विभाग

आंकड़ों की जुबानी
1 अप्रैल 2015 से 31 मार्च 2016 तक : 80 प्रोजेक्ट एप्रूव्ड, 100 प्रोजेक्ट को सैद्धांतिक मंजूरी, 176 प्रोजेक्ट पर ईडीएस(एसेंशियल डिटेल्स शॉर्ट), 4 प्रोजेक्ट रिजेक्ट, 5 प्रोजेक्ट वापस हुए।
1 अप्रैल 2016 से 14 जुलाई 2016 तक : 13 प्रोजेक्ट एप्रूव्ड, 20 प्रोजेक्ट को सैद्धांतिक मंजूरी, 164 प्रोजेक्ट पर ईडीएस(एसेंशियल डिटेल्स शॉर्ट), 1 प्रोजेक्ट रिजेक्ट और 1 प्रोजेक्ट वापस।

सरकार को मिले हैं कई विशेष अधिकार

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हरीश रावत - फोटो : अमरउजाला

वन क्षेत्र में निर्माण, रिपेयरिंग, सड़क चौड़ीकरण जैसे मामलों में वन भूमि हस्तांतरण के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने  राज्य सरकार को भी कई अधिकार दिए हैं। आपदा प्रभावित उत्तराखंड को देश के अन्य राज्यों के मुकाबले यह छूट ज्यादा है। प्रदेश के आठ जिलों में एक हेक्टेयर जबकि पांच आपदा प्रभावित जिलों में पांच हेक्टेयर तक वन भूमि हस्तांतरण की अनुमति का अधिकार राज्य के पास है, लेकिन इसका इस्तेमाल प्रभावी ढंग से नहीं हो रहा है।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय क्षेत्रीय कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक वन संरक्षण अधिनियम के तहत वन क्षेत्र में निर्माण के मामलों में राज्य सरकार के पास कई बड़े अधिकार हैं। आपदा प्रभावित जिलों रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ और बागेश्वर में राज्य सरकार को पांच हेक्टेयर तक वन भूमि हस्तांतरण की अनुमति का अधिकार प्राप्त है। जबकि, आठ जिलों में राज्य सरकार एक हेक्टेयर तक के निर्माण को अपने स्तर से अनुमति दे सकती है।

एक हेक्टेयर तक के उस क्षेत्र में राज्य सरकार को अनुमति देने का अधिकार है, जहां 50 पेड़ तक एक हेक्टेयर में हों। अगर इससे ज्यादा पेड़ लगे होंगे तो वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ही इसकी अनुमति देता है। खास बात यह भी है कि देश की सीमा के 100 किलोमीटर दायरे में सड़क निर्माण को अनुमति देने का अधिकार भी राज्य सरकार के पास सुरक्षित है। बावजूद इसके प्रदेश में कई जगहों पर अनुमति के चक्कर में सड़क निर्माण या सड़क चौड़ीकरण अटके रहते हैं।

इनके लिए अनुमति का अधिकार
स्कूल, हॉस्पिटल, इलेक्ट्रिक एंड टेलीकम्यूनिकेशन लाइन, पेयजल प्रोजेक्ट्स, जल व रेन वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर, माइन इरिगेशन केनेल्स, नोन कंवेंशनल सोर्सेज ऑफ एनर्जी, वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर्स, पावर सब स्टेशन, कम्यूनिकेशन पोस्ट्स, सड़क निर्माण या सड़क चौड़ीकरण, पुलों का चौड़ीकरण, पुलिस थाने का निर्माण।

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