केंद्र ने 'लापरवाही' न दिखाई होती तो उत्तराखंड में नहीं होती तबाही!
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बादल फटने और भारी बारिश के साथ होने वाली तबाही का पूर्वानुमान संभव है।
आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिक ने प्रत्येक पांच किलोमीटर में बारिश का सटीक आकलन कर डिजिटल एलीवेशन मॉडल (डीईएम) के जरिये निश्चित हिस्सों में होने वाली तबाही बताने वाली रिपोर्ट केंद्र को भेजी हुई है।
आठ माह बाद भी इसका संज्ञान नहीं लिया गया है। जबकि जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस तकनीक में रुचि दिखाई है। यदि केंद्र इस पर संज्ञान लेता तो पहाड़ को हालिया तबाही से बचाया जा सकता था।
आईआईटी रुड़की के जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन विभाग के प्रो. नयन शर्मा ने बताया कि उन्होंने नवंबर-2015 में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती की उपस्थिति में बाढ़ और उससे होने वाली तबाही के पूर्वानुमान पर तकनीक का प्रस्तुतीकरण दिया था।
उसमें बताया गया था कि किस तरह से सबसे उन्नत सैटेलाइट तकनीक से प्रत्येक पांच किलोमीटर के दायरे में बादल फटने, भारी बारिश और इससे होने वाली तबाही के बारे में सटीक भविष्यवाणी संभव है।
संबंधित तकनीक पर रिपोर्ट केंद्र को भेज दी थी
साथ ही बारिश से नदियों में आने वाले पानी के आयतन, वेग और इससे प्रभावित होने वाली आबादी पर भी आकलन प्रस्तुत किया गया था। उसके बाद संबंधित तकनीक पर रिपोर्ट केंद्र को भेज दी थी। लेकिन अभी तक सरकार ने इस पर रुचि नहीं दिखाई है। जबकि उत्तराखंड के लिए यह तकनीक बहुत जरूरी है। उनकी इस तकनीक पर जम्मू-कश्मीर सरकार ने गौर करते हुए डल झील के प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है।
भूस्खलन को भी किया जा सकता है नियंत्रित
बारिश के पूर्वानुमान के आधार पर नदियों में पानी के प्रवाह की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए नदियों को चैनेलाइज्ड करने के लिए इसकी गहराई और चौड़ाई को जरूरत के हिसाब से विकसित करने का काम किया जा सकता है। साथ ही तेज प्रवाह में पहाड़ों के भूस्खलन को रोकने के लिए रॉक बाल्टिंग तकनीक से इन्हें मजबूती प्रदान की जा सकती है।
आईएमडी (इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट) की ओर से केवल बारिश का पूर्वानुमान दिया जाता है। वह भी निर्धारित मॉडल के आधार पर जारी किया जाता है। लेकिन ग्लोबल प्रेसीपीटेशन मेजरमेंट तकनीक से विभिन्न सैटेलाइटों के जरिए बादलों के प्रतिक्षण दबाव एवं घनत्व के आधार पर जानकारी दी जा सकती है। यही नहीं, बारिश के साथ-साथ इससे होने वाली तबाही का आकलन भी नई तकनीक की खासियत में शामिल है।
- प्रो. नयन शर्मा, जल संसाधन एवं प्रबंधन विभाग, आईआईटी रुड़की
Published By : Nirmala Suyal