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मोदी ने उत्तराखंड के साथ फिर की नाइंसाफी

Mon, 10 Nov 2014 12:48 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 10 Nov 2014 12:48 AM IST
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uttarakhand did not get entry in cabinet.

लोकसभा चुनाव के नतीजों ने इस बार उत्तराखंड में भी कई तरह की इबारत लिखी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह प्रदेश गुजरात के बाद उत्तराखंड ही ऐसा प्रदेश रहा, जहां कुल मतदान का 56 प्रतिशत हिस्सा भाजपा को मिला।

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इसी के साथ पांचों लोकसभा सीटें जिताकर राजस्थान जैसे अग्रणी भाजपाई राज्यों की कतार में खुद को शामिल करने में भी उत्तराखंड कामयाब रहा। लेकिन भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व मंत्रिमंडल में जगह देने के नाम पर एक बार फिर उत्तराखंड को निराश कर गया।
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गठन के बाद मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार में भी उत्तराखंड के किसी सांसद को जगह नहीं मिली। पिछले दो दिनों से अल्मोड़ा सांसद अजय टम्टा के नाम की चर्चा थी, लेकिन विस्तार में उनकी बारी नहीं आई। इससे यहां जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में घोर निराशा का आलम है।
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लोकसभा चुनाव 2014 के नतीजे आए तो राज्य के भाजपाई कुछ ज्यादा ही खुश थे। कारण भी था। उत्तराखंड ने भाजपा के पक्ष में आज तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। कुल वोटिंग का 56 प्रतिशत हिस्सा भाजपा को मिला।

इतना ही नहीं, भाजपा के भगत सिंह कोश्यारी ने नैनीताल सीट से राज्य में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। यहां पर भगतदा को 6,36,769 वोट मिले। बाकी चार सीटों पर भी भाजपा के ही सांसद चुने गए।

भाजपा को उठाना पड़ सकता है नुकसान

uttarakhand did not get entry in cabinet.

बावजूद इन सबके, उत्तराखंड की ओर से दूसरी बार भी केंद्रीय नेतृत्व ने मुंह फेर लिया। इस बार कम से कम एक सदस्य को मंत्रिमंडल में जगह मिलने की पूरी उम्मीद थी, लेकिन वह धराशायी हो गई। इससे प्रदेश के लाखों भाजपा कार्यकर्ताओं में बेचैनी और निराशा है।

विश्लेषक मानते हैं कि आने वाले दिनों में भाजपा को इसका नुकसान भी हो सकता है। कांग्रेस भी अब इस मुद्दे को और हवा देगी।

उम्र की सीमा तय होने और लालकृष्ण आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी के मंत्रिमंडल से बाहर रहने पर पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी तो मानसिक तौर पर लगभग तैयार थे कि अब उन्हें शायद ही मौका मिले। लेकिन वरिष्ठता के लिहाज से भगतदा को भी हाशिए पर धकेलना कार्यकर्ताओं को खल गया।

यूपी के जमाने से राज्य में कैबिनेट मंत्री रहे रमेश पोखरियाल निशंक भी निपटा दिए गए। अजय टम्टा के नाम का शोर तो बहुत हुआ लेकिन नतीजा फिर वही, झोली की खाली की खाली रह गई।

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