यूपी निकाय चुनाव में हार के बाद सदमे में उत्तराखंड कांग्रेस, इस कारण डूबेगी लुटिया
यूपी के चुनाव प्रदेश संगठन के लिए महज झटका नहीं है, बल्कि कड़ा सबक भी हैं। मगर कांग्रेस नेता सबक सीखने को तैयार नहीं हैं। विधानसभा चुनाव में जिस गुटबाजी के कारण पार्टी की लुटिया डूबी, उससे उसका अभी तक पीछा नहीं छूटा है। सीमा विस्तार के मुद्दे पर ही शीर्ष नेताओं की अपनी ढपली, अपना राग है।
निकायों के सीमा विस्तार पर पार्टी खुद को निसंदेह मुखर दिखा रही है। लेकिन इस मसले पर भी उसका एकजुट संघर्ष नदारद है। इसकी दो ताजा बानगी सामने है। पहली नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश से मुत्तालिक है। नेता प्रतिपक्ष के नाते उन्होंने विधानसभा में प्रेस कांफ्रेंस की। मगर विपक्ष की नेता के साथ एक भी वरिष्ठ विधायक मौजूद नहीं था।
बेशक ये इत्तफाक हो, लेकिन प्रेस कांफ्रेंस के लिए विधानसभा में उठाए जाने वाले प्रमुख मुद्दों के बारे में बताने के लिए उन्होंने ऐसा दिन चुना, जब प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और वरिष्ठ विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल राजधानी से बाहर थे।
कांग्रेस किसी एक मुद्दे पर भी एकजुट नहीं
शनिवार को प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह भी सीमा विस्तार के मुद्दे पर राज भवन पहुंच गए। नेता प्रतिपक्ष ने सदन के भीतर निकायों के सीमा विस्तार का मुद्दे से सत्र का आगाज करने का एलान किया था, प्रीतम ने उसी दिन सड़क पर आंदोलन छेड़ने को बिगुल फूंक दिया।
बिगुल दोनों शीर्ष नेता एकसाथ मिलकर भी फूंक सकते थे। अब पूर्व कैबिनेट मंत्री ने सीमा विस्तार के विरोध में आमरण अनशन का एलान कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय अपने-अपने मोर्चों पर अपने-अपने अंदाज में सियासत कर रहे हैं।
कुल मिलाकर कांग्रेस किसी एक मुद्दे पर एकजुट होती नहीं दिखाई दे रही है। ऐसे हालातों में भाजपा से वह विधान सभा चुनाव की हार का बदला कैसे ले सकेगी, ये अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है? इस प्रश्न के जवाब में उसके नेताओं के पास गुटबाजी से उबरने के समाधान के बजाय विरोधी पार्टी की कारगुजारियों का विरोध है जिसके जरिये वह निकाय चुनाव में संभावनाएं तलाश रहे हैं।
पार्टी के मुख्य प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी कहते हैं,‘यूपी में भाजपा वहीं जीती हैं, जहां ईवीएम पर चुनाव है। बैलेट पेपर पर उसे पराजय के सामना करना पड़ा है। कांग्रेस उत्तराखंड में भी मतपत्रों पर चुनाव कराने की लड़ाई लड़ेगी।