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गैरसैंणः विपक्ष ने हिसाब मांगा तो सीएम हुए दार्शनिक

Mon, 09 Jun 2014 08:34 PM IST
गैरसैंण से अजित सिंह राठी
गैरसैंण से अजित सिंह राठी Updated Mon, 09 Jun 2014 08:34 PM IST
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uttarakhand assembly session in gairsain

राजधानी देहरादून से दूर विधानसभा का पहला तीन दिवसीय सत्र गैरसैंण में सोमवार से शुरू हुआ। पहले दिन गैरसैंण के विकास को लेकर सरकार के पास कोई एजेंडा नहीं था।

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गैरसैंण से अजित सिंह राठी
सत्र शुरू हुआ तो विपक्ष खड़ा हो गया और सबसे पहले दैवी आपदा के बाद हुए कार्यो पर चर्चा कराने की मांग करने लगा।

स्पीकर ने हस्तक्षेप किया और प्रश्नकाल के बाद चर्चा कराने की बात कही तो विपक्ष शांत हो गया। इससे पहले दिन भी विधायकों के लिए एक खास किस्म की टोपी तैयार कराई गई थी।
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हर विधायक व अफसर को तिलक करने के साथ ही एक एक टोपी देकर विधानसभा भेजा गया। यह एक नई जगह की नई परंपरा थी।

बदइंतजामी भी थी

uttarakhand assembly session in gairsain

हल्के फुल्के शोर शराबे के बाद शुरू हुआ सदन इसके बाद शाम तक पूरी तरह से व्यवस्थित रहा। हंसी ठिठोली, आक्रामकता आदि का समावेश लिए पूरा दिन गुजरा।

सभी एक जैसी टोपी लगाकर सदन में आए थे। बदइंतजामी भी थी। कार्यवाही शुरू हुई तो साउंड सिस्टम ने जवाब दे दिया। दो बार बिजली गुल हुई लेकिन बैक-अप होने के कारण फजीहत होने से बच गई।

आधे से ज्यादा विधायकों, पत्रकार, अफसर दीर्घा में पंखे तक नहीं थे। दिन भर पानी के लिए त्राहि त्राहि मचती रही। क्योंकि पानी की आपूर्ति बढ़ने की गुंजाइश नहीं के बराबर थी।

विपक्ष पूरे दिन सरकार को टोकता रहा। नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने कहा कि इसी सत्र में सरकार गैरसैंण को जिला व राजधानी बनाने की घोषणा करे। पूरे दिन इसी को लेकर जद्दोजहद होती रही। लेकिन शाम तक तमाम चीजे किनारे करके निर्बाध तरीके से सत्र संचालित हुआ।

आपदा पीड़ितों के जख्मों से ऊपर है यात्रा

uttarakhand assembly session in gairsain

एक वर्ष बाद भी मुआवजे की राशि गिनाने के सिवाय आपदा पीड़ितों के लिए सरकार के हाथ खाली नजर आए। पहली बार उत्तराखंड वासियों की संवेदनाओ के केंद्र गैरसैंण में उत्तराखंड के गांधी के नाम से मशहूर स्व. इंद्रमणि बड़ोनी के नाम पर बनाए गए विधान मंडप में राज्य के उन 337 गांवों के विस्थापन के बारे में सरकार कोई स्पष्ट वक्तव्य सदन में नहीं दे सकी जो कि मौत के मुहाने पर बसे हैं।

दैवी आपदा के बाद एक साल में हुए राहत कार्यो को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सलीके  से तकरार देखने को मिली। नियम-58 के तहत हुई चर्चा में मुख्यमंत्री हरीश रावत विपक्ष को संतुष्ट नहीं कर सके और पूरे समय मुआवजे की राशि बढ़ाने और कुछ सड़कों के ठीक कराए जाने का हवाला देते रहे।

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सरकार से जवाब मांगा

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नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने शुरूआती दौर में ही सरकार से आपदा राहत कार्यों और पुनर्वास की सख्त जरूरत वाले 337 गांवों पर सरकार से जवाब मांगा।

भट्ट ने कहा कि अगस्त्यमुनि समेत कई स्थानों पर कच्ची मिट्टी डालकर काली करने का आरोप लगाया। भाजपा के मदन कौशिक ने कहा कि दैवी आपदा की बरसी आने वाली है, लेकिन सरकार ने ना तो कोई नीति बनाई और ना ही विकास के रोड मैप के लिए किसी समिति का गठन किया।

कौशिक का कहना था कि जिन गांवों का विस्थापन होना है अभी तक उनका सर्वे भी नहीं किया जा सका। भाजपा के बिशन सिंह चुफाल व तीरथ सिंह रावत ने भी सरकार को घेरा।

हरीश रावत का दार्शनिक अंदाज

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लेकिन इतना होने पर जब मुख्यमंत्री हरीश रावत सदन में सरकार का पक्ष रखने के लिए खड़े हुए तो दार्शनिक बाते तो खूब की लेकिन आर्गेनाइज तरीके से अभी तक क्या कर पाए, यह स्पष्ट नहीं कर सके।

पीड़ितों के जख्मों के ईलाज के बजाय मुख्यमंत्री के एजेंडे में चार धाम यात्रा रही। सरकार ने सदन में चार धाम यात्रा का इतना महिमामंडम किया कि आपदा पीड़ितों के जख्म छोटे पड़ गए।

मुख्यमंत्री ने आपदा से प्रभावितों को ऋण के ब्याज से दो के बजाय तीन वर्ष तक माफी देने की बात तो की लेकिन पुनर्वास, अवस्थापना विकास कार्यों पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।

सरकार डगमगाने लगी

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मुख्यमंत्री ने नेता प्रतिपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ दिन ठहर जाइए, फिर देखना कि आप पेंट में हाथ डालकर गौरीकुंड से रामबाड़ा तक जा सकेंगे। लेकिन जब नेता प्रतिपक्ष ने केदारनाथ मंदिर में दबी लाशों को निकालने का जिक्र किया तो सरकार डगमगाने लगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि धारचूला व मुनस्यारी के होटलियर के लिए भी ऋण में पहले दो साल का ब्याज माफ कर दिया गया है। 434 सड़कों का पुनर्निर्माण हो चुका है। लेकिन विपक्ष विस्थापित होने वाले गांवों के बारे में जवाब चाहता था, जो अंत तक नहीं मिल सका।

कुल मिलाकर आपदा को लेकर सरकार को यात्रा शुरू कराने की ज्यादा फिक्र दिखी और आपदा प्रभावितों के लिए दर्द कुछ कम होता दिखा।

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