Uttarakhand@23: पर्यावरण का मूल्य चुकाया, ग्रीन बोनस नहीं मिल पाया, पढ़ें उत्तराखंड की पीड़ा पर ये खास रिपोर्ट
आय के सीमित साधनों वाले उत्तराखंड राज्य की पर्यावरणीय सेवाओं के एवज में ग्रीन बोनस से बड़ी आस है। लेकिन राज्य की यह आस केंद्र सरकार ही पूरी कर सकती है।
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उत्तराखंड के 71 प्रतिशत भू-भाग पर खड़ा जंगल पूरे देश को फायदा पहुंचा रहा है, लेकिन इसके बदले हमें क्या मिल रहा है? बीते माह गुजरात में हुए देशभर के वन मंत्रियों के सम्मेलन में वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इस सवाल के जरिए ही उत्तराखंड की पीड़ा को बयां किया था। यही सवाल उत्तराखंड बीते 22 वर्षों से पूछ रहा है।
आय के सीमित साधनों वाले उत्तराखंड राज्य की पर्यावरणीय सेवाओं के एवज में ग्रीन बोनस से बड़ी आस है। लेकिन राज्य की यह आस केंद्र सरकार ही पूरी कर सकती है। बीते दो विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा जोर-शोर से उठा। सत्ताधारी दल भाजपा के नेताओं ने डबल इंजन का दम दिखाकर ग्रीन बोनस का सपना भी दिखाया, लेकिन यह आज तक पूरा नहीं हो पाया। केंद्र से राज्य को समय-समय पर विभिन्न मदों में कई तरह की इमदाद तो मिलती रही, लेकिन यह राज्य की जरूरतों के हिसाब से नाकाफी है।
उत्तराखंड विकास की कीमत पर पर्यावरण को बचा रहा है और इसके लिए न सिर्फ विकास, बल्कि अन्य कई दुश्वारियां भी झेलनी पड़ रही हैं। राज्य के पास नए उद्योग लगाने के लिए भूमि नहीं बची है। पर्यावरण की कीमत पर हमारी तमाम जल विद्युत परियोजनाओं पर केंद्रीय एजेंसियों का पहरा है। किसी गांव तक एक छोटी सी सड़क बनाने के लिए हमें हर बार केंद्र सरकार का मुंह ताकना पड़ता है।
इन दुश्वारियों से होना पड़ता है दो-चार
- वन कानूनों के कारण विकास की पहली सीढ़ी यानी हमारी तमाम सड़कें नहीं बन पा रही हैं।
- पेयजल लाइनें बिछाने तक के लिए गहमें वन एवं पर्यावरण मंत्रालय केंद्र सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है।
- कई जल विद्युत परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं, कईयों पर काम ही शुरू नहीं हो पा रहा है।
- वन्यजीवों ने दिन का चैन और रातों की नींद उड़ाई हुई है। बाघ, गुलदार, भालू जैसे हिंसक जानवर आए दिन लोगों को मौत के घाट उतार रहे हैं।
- आय के सीमित साधन, नए उद्योगों के लिए जमीन की कमी, खनन आय का प्रमुख स्रोत के बावजूद इसमें भी वन कानूनों का पेच है।
हिमालयी राज्यों में वनों की स्थिति
हिमालयी राज्यों में हिमाचल प्रदेश में 66.52, उत्तराखंड में 71.05, सिक्किम में 82.31, अरूणाचल प्रदेश 79.33, मणिपुर में 74.34, मेघालय में 76.00, मिजोरम में 84.53, नगालैंड में 73.90, त्रिपुरा में 60.02, असम में 34.21 फीसदी वन क्षेत्र मौजूद हैं।
(नोट: आंकड़े एफएसआई की ओर से तैयार इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट-2021 के अनुसार )
पर्यावरणीय सेवाओं का मूल्य
- भोपाल के इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर फॉरेस्ट मैनेजमेंट के सहयोग से तैयार रिपोर्ट ‘ग्रीन एकाउंटिंग ऑफ फॉरेस्ट रिसोर्स, फ्रेमवर्क फॉर अदर नेचुरल रिसोर्स एंड इंडेक्स फॉर सस्टनेबल एनवायरमेंटल परफॉर्मेंस फॉर उत्तराखण्ड स्टेट’ में राज्य के वन संसाधनों के आर्थिक महत्व को मौद्रिक रूप में मापने का प्रयास किया गया।
- राज्य की 18 वन सेवाओं का फ्लो वेल्यू 95,112,60 करोड़ और तीन सेवाओं की स्टॉक वेल्यू 14,13,676.20 करोड़ आंकी गई है।
- उत्तराखंड हर वर्ष पूरे देश को 95 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की पर्यावरणीय सेवाएं मुहैया करा रहा है।
- यदि किसी राज्य को उसके पर्यावरणीय उत्पादों का भुगतान किया जाए तो इतनी रकम राज्य की आर्थिक जरूरतों को पूरा कर सकती है।
जीईपी पर भी नहीं बनी बात
उत्तराखंड सरकार ने जीडीपी की तर्ज पर जीईपी (ग्रॉस इंवायरमेंटल प्रोडक्ट) के आकलन का खाका तैयार कर केंद्र सरकार के सामने रखा है, लेकिन अब तक इस पर भी बात नहीं बन पाई है।