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श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही बदरीनाथ के ब्रह्म कपाल में जुटने लगे श्रद्धालु, ये है इस तीर्थ की खासियत

Mon, 16 Sep 2019 12:06 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal प्रमोद सेमवाल, अमर उजाला, गोपेश्वर
प्रमोद सेमवाल, अमर उजाला, गोपेश्वर Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Mon, 16 Sep 2019 12:06 PM IST
सार

  • गया से आठ गुना अधिक फल देने वाला बताया गया है इस तीर्थ को 
  • हजारों तीर्थयात्री और स्थानीय श्रद्धालु पितरों के उद्धार के लिए पहुंचते हैं 

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Shraddha Paksha begins devotees started gathering in the Brahma kapal of Badrinath
- फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

पवित्र श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही बदरीनाथ धाम स्थित ब्रह्म कपाल में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गई है। ब्रह्म कपाल में पितरों को पिंडदान का विशेष महात्म्य है। स्कंदपुराण में इस पवित्र स्थान को गया से आठ गुना अधिक फलदायी तीर्थ कहा गया है। पितर पक्ष शुरू होते ही हर वर्ष तीर्थयात्रियों के साथ ही हजारों स्थानीय श्रद्धालु अपने पितरों के उद्धार के लिए ब्रह्मकपाल पहुंचते हैं। 

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बदरीनाथ धाम से पांच सौ मीटर की दूरी पर स्थित ब्रह्मकपाल में अलकनंदा नदी के किनारे एक विशाल शिला (पत्थर) मौजूद है, जहां हवन कुंड में पितरों के उद्धार के लिए पिंडदान कर हवन क्रिया की जाती है। आचार्य विशंबर दत्त नौटियाल का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु हो जाए तो ब्रह्मकपाल में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से दिवगंत की आत्मा को शांति मिलती है।
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बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के मीडिया प्रभारी डा. हरीश गौड़ का कहना है कि ब्रह्मकपाल में पितर तर्पण के लिए श्राद्ध पक्ष में तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ जाती है। विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के तीर्थयात्री भी अपने पितरों के श्राद्ध के लिए ब्रह्मकपाल में पहुंचते हैं।

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धन-धान्य में होती है वृद्धि

बदरीनाथ के मुख्य धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल का कहना है कि यहां पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। तर्पण करने से पहले तप्तकुंड में स्नान करने के बाद तीर्थ पुरोहित के साथ ब्रह्म कपाल में पितरों का ध्यान किया जाता है। पितरों को श्रद्धा भक्ति से पूजने पर धन-धान्य में वृद्धि होती है। मुख्य धर्माधिकारी कहते हैं कि पितरों का श्राप देवताओं से भी अधिक कष्टकारी होता है। ज्योतिषशास्त्र में बताया गया है कि जिनके पितर नाराज हो जाते हैं, उनकी ग्रह दशा अच्छी भी हो, तब भी उनके जीवन में हर पल परेशानी बनी रहती है।

ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए थे भगवान शिव  
पौराणिक मान्यता है कि सृष्टि की उत्पति के समय जब ब्रह्मा मां सरस्वती के रुप पर मोहित हो गए तो भोलेनाथ ने गुस्से में आकर ब्रह्मा के पांच सिरों में से एक को त्रिशूल के वार से काट दिया। तब सिर त्रिशूल पर ही चिपक गया। ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए जब भोलेनाथ पृथ्वी लोक के भ्रमण पर गए तो बदरीनाथ से करीब पांच सौ मीटर की दूरी पर त्रिशूल से ब्रह्मा का सिर जमीन पर गिर गया। तभी से यह स्थान ब्रह्म कपाल के रुप में प्रसिद्ध हुआ। शिवजी भी इसी स्थान पर ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए थे। गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए स्वर्ग की ओर जा रहे पांडवों ने भी इसी स्थान पर अपने पितरों को तर्पण दिया था।

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