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देहरादून: लीकेज से आमजन, खर्च से जलसंस्थान परेशान, खर्चा बढ़कर 3.49 करोड़ पर पहुंचा

Wed, 31 Jul 2019 03:54 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal अनिल चन्दोला, अमर उजाला, देहरादून
अनिल चन्दोला, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Wed, 31 Jul 2019 03:54 PM IST
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public suffers from leakage jal sansthan from expenditure
प्रतीकात्मक - फोटो : pexels.com

शहर में वर्षों पहले बिछाई गई पेयजल लाइनों में आए दिन होने वाली लीकेज से जहां आम लोग परेशान हैं, वहीं इनकी मरम्मत में होने वाली खर्च से जल संस्थान की दिक्कतें बढ़ती जा रही है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान मरम्मत में होने वाले खर्च में तीन गुना से भी ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है। 

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राजधानी के कई इलाकों में पेयजल की नई लाइनें बिछाई गई हैं। इसमें से कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां नई लाइनें डाली तो गई लेकिन उनमें अब तक सप्लाई शुरू नहीं हो पाई है। वहीं, शहर का बड़ा हिस्सा ऐसा है, जहां पुरानी लाइनों के माध्यम से सप्लाई हो रही है। इसके चलते आए दिन लाइनों में टूट फूट की दिक्कत हो रही है। इससे अलग-अलग इलाकों में लीकेज और आपूर्ति बाधित होने की दिक्कत बनी रहती है। 
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पुरानी लाइनों की मरम्मत के लिए जल संस्थान को भी ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। पिछले कुछ सालों के दौरान मरम्मत का यह खर्च तीन गुना से ज्यादा बढ़ गया है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2008 में जहां प्रतिवर्ष मरम्मत पर 1.10 करोड़ खर्च हो रहे थे, वहीं 2017-18 में यह बढ़कर 3.49 करोड़ तक पहुंच गया है। 
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एडीबी विंग बिछा रही लाइन
शहर में एडीबी विंग की ओर से लाइनें बिछाई जा रही है। 70 करोड़ रुपये खर्च कर अब तक 154.89 किमी नई लाइनें बिछाई गई हैं। लेकिन इनमें से केवल 51.15 किमी लंबी लाइनें ही अब तक हस्तांतरित हो पाई है। इसमें से भी कुछ पर पेयजल आपूर्ति शुरू नहीं हो पाई है। 

उत्तर शाखा में स्थिति बेहतर
शहर के उत्तर शाखा क्षेत्र में 598 किमी लंबी पेयजल लाइन है। इसमें से 41.07 किमी नई लाइनें बिछाई गई है। 528 किमी क्षेत्र में अब भी पुरानी लाइनों से सप्लाई हो रही है। दक्षिण शाखा (मुख्य शहर का इलाका) में 1510 किमी लाइनों में से करीब 10 किमी नई है, जिनमें आपूर्ति हो रही है। 


पुरानी लाइनों में टूूट-फूट की समस्या ज्यादा रहती है। इससे लीकेज और आपूर्ति बाधित होने की शिकायतें अक्सर रहती हैं। साथ ही मरम्मत पर भी खर्च ज्यादा हो रहा है। नई लाइनें बिछने से यह समस्या दूर हो जाएगी।
- नीलिमा गर्ग, महाप्रबंधक, जल संस्थान

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