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अब एक किमी दूर से देख पाएंगे गोमुख के निशान

Fri, 12 Aug 2016 08:06 AM IST
रजा शास्त्री / अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री / अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 12 Aug 2016 08:06 AM IST
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public can see gomukh from one km away
Gomukh

गंगोत्री ग्लेशियर का गोमुख बहने के बाद अब इसके निशान एक किमी दूर से ही देखने को मिलेंगे। गंगोत्री ग्लेशियर के अस्तित्व की सुरक्षा को देखते हुए गोमुख के दर्शन करने की दूरी को पांच सौ मीटर से बढ़ाकर एक हजार मीटर करने की योजना है।

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इसके साथ ही विज्ञानियों ने नमामि गंगे परियोजना के तहत गंगोत्री ग्लेशियर के ऊपर से जाने वाले तपोवन मार्ग पर आवाजाही बंद करने का सुझाव दिया है। शिवलिंग चोटी के दर्शन करने जाने के लिए वैकल्पिक मार्ग बनाने का मशविरा दिया गया है।
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शिवलिंग चोटी, मोनी बाबा की गुफा के दर्शनों को जाने के लिए गंगोत्री ग्लेशियर के ऊपर से 9 किमी लंबा तपोवन मार्ग जाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रहे तापमान ने ग्लेशियरों के लिए खतरा पैदा कर दिया है। इसके साथ ही लोगों की आवाजाही के कारण यहां के माइक्रो क्लाइमेट में बदलाव आना शुरू हो गया है।

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लोगों के आने जाने की वजह से यहां गंदगी फैली रहती है

public can see gomukh from one km away
Gomukh

इस पर वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के विज्ञानियों ने केंद्र को भेजी अपनी रिपोर्ट में इस मार्ग पर आवाजाही बंद करने का सुझाव दिया है। अभी एक दिन में डेढ़ सौ लोगों के तपोवन मार्ग पर जाने की अनुमति है। लोगों के आने जाने की वजह से यहां गंदगी फैली रहती है।

प्याज, बोतलें, पाउच वगैरह लोग यहां छोड़ जाते हैं। भोजवाला से तपोवन तक शौचालय की भी व्यवस्था नहीं हैं। इस वजह से यहां की पर्यावरणीय स्थिति बिगड़ रही है। कचरे के कारण गंगोत्री के अलावा डोकरानी ग्लेशियर पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

विज्ञानियों ने भागीरथी नदी पर भोजवासा के पास पुल बनाकर वैकल्पिक मार्ग बनाने का सुझाव दिया है, जिससे लोग तपोवन मार्ग का इस्तेमाल कम से कम करें। इसके साथ ही विज्ञानियों ने गंगोत्री धाम के माइक्रो क्लाइमेट का नए सिरे से अध्ययन शुरू कर दिया है, जिससे पर्यावरण के नुकसान को आंका जा सके।

ग्लेशियर बहुत संवेदनशील होते हैं। तपोवन का वैकल्पिक मार्ग बनने से पर्यावरण के लिए खतरा कम होगा। यह रास्ता गंगोत्री ग्लेशियर के ऊपर से जाता है। नियंत्रण होने पर यहां कचरा आदि भी नहीं फैलेगा। नमामि गंगे की रिपोर्ट में इस संबंध में सुझाव दिया गया है।
- डॉ. समीर तिवारी, गंगोत्री प्रभारी, वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान

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