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घर की दहलीज लांघकर बसंती बिष्ट ने लिया था उत्तराखंड आंदोलन में भाग
अनिल चन्दोला/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 27 Jan 2017 11:16 AM IST
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Basanti Bisht
- फोटो : AmarUjala
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जिस उम्र में महिलाएं घर-परिवार संभालते हुए खुद को घर की दहलीज के भीतर सीमित कर देती हैं, बसंती बिष्ट ने उस उम्र में पहली बार हारमोनियम संभालकर विधिवत अभ्यास शुरू किया।
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राज्य आंदोलन के दौर में उन्होंने जनगीत लिखे और जनता के बीच जाकर गाए। इससे उन्हें मंच पर चढ़ने का आत्मविश्वास मिला। 40 साल की उम्र में पहली बार उन्होंने मंच पर जागर गाए तो श्रोता उनकी सुमधुर आवाज की तारीफ किये बिना न रह सके। पिछले करीब 20 वर्षों से उनका संगीत का सफर अनवरत जारी है।
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पद्मश्री मिलने की घोषणा के बाद अमर उजाला से विशेष बातचीत करते हुए बसंती ने बताया कि उनके गांव और पहाड़ में महिलाओं के मंच पर जागर गाने की परंपरा नहीं थी। मां ने उन्हें सिखाया लेकिन बाकि कोई प्रोत्साहन नहीं मिला। वह गीत-संगीत में तो रुचि लेती लेकिन मंच पर जाकर गाने की उनकी हसरत सामाजिक वर्जनाओं के चलते पूरी नहीं हो सकी।
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शादी के बाद उनके पति ने उन्हें प्रोत्साहित तो किया लेकिन समाज इतनी जल्दी बदलाव के लिए तैयार नहीं था। इसी बीच करीब 32 वर्ष की आयु में वह अपने पति रणजीत सिंह के साथ पंजाब चले गईं।
पति ने उन्हें गुनगुनाते हुए सुना तो विधिवत रूप से सीखने की सलाह दी। पहले तो बसंती तैयार नहीं हुई लेकिन पति के जोर देने पर उन्होंने सीखने का फैसला किया। हारमोनियम संभाला और विधिवत रूप से सीखने लगी।
मुजफ्फरनगर, खटीमा और मसूरी गोलीकांड की पीड़ा को उन्होंने गीत में पिरोया और राज्य आंदोलन में कूद पड़ी। अपने लिखे गीतों के जरिये वह लोगों से राज्य आंदोलन को सशक्त करने का आह्वान करती। राज्य आंदोलन के तमाम मंचों पर वह लोगों के साथ गीत गाती। इससे उन्हें मंच पर खड़े होने का हौसला मिला।
40 वर्ष की आयु में पहली बार वह गढ़वाल सभा के परेड ग्राउंड में सजे मंच पर जागरों की एकल प्रस्तुति के लिए पहुंची। अपनी मखमली आवाज में जैसे ही उन्होंने मां नंदा का आह्वान किया पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। दर्शकों को तालियों ने उन्हें जो ऊर्जा और उत्साह दिया, वह आज भी कायम है। उन्हें खुशी है कि उत्तराखंड के लोक संगीत को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है।