10 रुपए दो और गंगा को जितना चाहे मैला करो
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हरिद्वार में गंगा नदी में गंदगी रोकने के लिए जुर्माने का प्रावधान तो है लेकिन यह सच है कि वर्ष 1916 का एक, दो, पांच और दस रुपए तक के दंड के प्रावधान का 21वीं सदी में मतलब नहीं है।
अधिकारी यह कहकर पिंड छुड़ा लेते हैं कि आज इस जुर्माने से कोई नहीं डरता। अब केंद्र की ओर से दस हजार रुपए जुर्माना और तीन दिन की जेल का प्रावधान की बात कही जा रही है।
इससे नियम-कानून का उल्लंघन करने वालों में भय पैदा होगा। यहां के लोग भी मानते हैं कि गंगा में गंदगी को सख्त कानून रोक सकता है।
गंगा सफाई पर पुराना कानून लागू
केंद्र सरकार गंगा को निर्मल एवं स्वच्छ बनाने के लिए सख्त कानून बनाने पर जोर दे रही है। गंगा में थूकने वालों तक पर जुर्माना और जेल भेजने की बात कही जा रही है।
लेकिन हरिद्वार में इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान 98 वर्ष पहले से है। बावजूद इसके प्रशासन और नगर निगम इसका पालन नहीं करवा पा रहा है। किसी में नियम-कानून का डर भी नहीं है।
वर्ष 1916 में नगरपालिका यूनियन हरिद्वार के बायलॉज में गंगा जी में कुल्ला करना, साबुन लगाकर नहाना, कपड़े, बर्तन धोना, वाहनों की धुलाई वर्जित है।
गंगा की ओर दुकान का मुंह खोलना और अंगीठी जलाने पर भी रोक है। अर्द्धकुंभ (1992) एसएसपी एलपी मिश्रा, अपर मेलाधिकारी बाबा हरदेव सिंह ने बायलॉज का पालन कराने का प्रयास भी किया था। कई लोगों के चालान भी किए गए थे।
लेकिन फिलहाल अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। हाल यह है कि इस समय गंगा के कई घाट धोबीघाट नजर आते हैं। पालिका ने ही सैकड़ों दुकानों के मुंह गंगा की ओर खोल दिए हैं।
विभाग ने अपना नाम ही बदल दिया
केंद्र सरकार ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए ‘गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई’ का गठन भी किया था। गंगा में बढ़ते प्रदूषण को लेकर हाईकोर्ट व सुप्रीमकोर्ट ने व्यवस्था को कई बार फटकार लगाई। उसके बाद इस विभाग ने अपना नाम ही बदल दिया।
उसने गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई से अपना नाम बदलकर निर्माण एवं अनुरक्षण इकाई (गंगा) रख लिया है। अब इस विभाग के अधिकारी कहते हैं गंगा में प्रदूषण से उनका कोई मतलब नहीं है।
सीवरेज का बाईपास गंगा में
गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए बने विभाग ने शहर में जहां भी सीवरेज पंपिंग स्टेशन स्थापित किए हैं। अधिकारिक रूप से सीवर का बाईपास का प्रावधान रखा गया है।
पंपिंग स्टेशनों पर बिजली न होने पर जनरेटर की व्यवस्था है, लेकिन डीजल बचाने के लिए सीवर गंगा की तरफ खोल दिए जाते हैं।
मृतक का सामान भी गंगा में
मृतक के फटे पुराने कपड़े, शेष दवाईयां, एक्स-रे, किताबें डायरी, रजाई तक गंगा में बहाई जा रही हैं। दुर्घटना में मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार से पहले गंगा जी में डुबकी लगवाई जाती है। खून गंगा में बहता है, लेकिन रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है।
गंगा की स्वच्छता को लेकर सख्त कानून बने अच्छी बात है। लेकिन धरातल पर भी उसके पालन कराने की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। अर्द्धकुंभ (1992) एसएसपी एलपी मिश्रा, अपर मेलाधिकारी बाबा हरदेव सिंह ने नगरपालिका बायलॉज का पालन कराने का प्रयास किया था। कई लोगों के चालान किए थे। लेकिन अब अधिकारी और जनप्रतिनिधि बायलॉज को पढ़ते तक नहीं।
- दुर्गाशंकर भाटी, पूर्व सभासद नगरपालिका