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पितृपक्ष 2019: शास्त्रों में किसी वस्तु की खरीद-फरोख्त पर नहीं है रोक, केवल इनकी है मनाही

Sat, 14 Sep 2019 12:42 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal जूही प्रजापति, अमर उजाला, देहरादून
जूही प्रजापति, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 14 Sep 2019 12:42 PM IST
सार

- पितरों के स्तुतिगान का पक्ष है पितृपक्ष
- कनागत में केवल विवाह, प्राण-प्रतिष्ठा और गृह प्रवेश की है मनाही 

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Pitru Paksha 2019 myths of shradh
प्रतीकात्मक तस्वीर

विस्तार

श्राद्ध पूर्वजों के सांस्कृतिक और धार्मिक सरोकारों से जुड़ने की व्यवस्था है, 15 दिन के इस समय को पितृपक्ष व कनागत भी कहा जाता है। इस एक पखवाड़े में अपने पूर्वज और असमय परलोक गमन करने वाले परिजनों के प्रति कृतज्ञता जताते हुए उनका मनन करते हुए तर्पण करते हैं, लेकिन इस में कुछ भ्रांतियां श्राद्ध के पवित्र उद्देश्य से भटका देती हैं।

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खासकर किसी वस्तु का खरीदना अथवा बचना आदि। खास बात ये है कि यह भ्रांति कहां से चली इसका किसी को पता ही नहीं है। इसके कारण लोग अपने जरूरी काम करने में भी संकोच करते हैं। 

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ज्योतिष भी विज्ञान के दायरे में आ गया है

ज्योतिषाचार्य गौरव आर्य के अनुसार, हाईटेक युग में पुरातन विषय ज्योतिष भी विज्ञान के दायरे में आ गया है। अब विश्वविद्यालयों में ज्योतिष सूत्रों पर शोध भी हो रहेे हैं, लेकिन किसी ने इस भ्रांति के बारे में सोचने की जहमत नहीं उठाई कि पितृपक्ष में किसी वस्तु की खरीदारी न करने का क्या आधार है।

यह कब से चली, किसने चलाई? किसी पंडित ने बताई तो किस शास्त्र के आधार पर बताई। इस बारे में किसी ने कोई सवाल ही नहीं उठाया। बस तमाम अन्य भ्रांतियों की तरह यह भी रूढ़ि में प्रचलित हो गई। नतीजतन पूर्वजों के स्तुतिगान के बजाय श्राद्ध को हव्वा मान लिया गया। 

भ्रम न पालें

ज्योतिषाचार्य के अनुसार शास्त्रों में स्पष्ट वर्णित है कि श्राद्ध पक्ष पितरों के प्रति चिंतनशील और श्रद्धावान रहने का काल है, न कि भ्रम पालने का। विद्वानों का कहना है कि श्राद्धकाल में किसी वस्तु के खरीदने-बेचने अथवा नया काम करने की कोई मनाही नहीं है। 

भविष्य पुराण, कूर्म पुराण और हरिवंश पुराण का हवाला देते हुए आचार्य ने बताया कि श्राद्ध पक्ष में किसी सामान के क्रय-विक्रय, व्यापार का प्रारंभ, मुहूर्त, नए आभूषण, पौधारोपण, अन्नप्राशन और नामकरण पर कोई रोक नहीं है। केवल विवाह, प्राण-प्रतिष्ठा और गृह प्रवेश की मनाही है।

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पूर्वजों के आशीर्वाद का समय

काशी विश्वनाथ पंचांग में भी उल्लेख है कि श्राद्ध पक्ष पूर्वजों के आशीर्वाद का समय है। इस काल में पितरों की पसंद ही नहीं, बल्कि अपनी पसंद का कोई सामान पितरों का स्मरण कर खरीदें तो उस पर पितरों का आशीर्वाद बरसता है। यह काल पूर्वजों के स्तुतिगान का है न कि भ्रांति पालने का।

श्राद्ध में क्रय-विक्रय के शुभ योग
आचार्य ने बताया कि 15 सितंबर को सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। 17 सितंबर को स्थायी जय, स्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि का योग है। श्राद्ध काल में द्विपुष्कर योग भी है। 18 सितंबर को यायी योग है। इन शुभ योग में नया वाहन, नवीन आभूषण, कपड़ा, जमीन या अन्य वस्तुओं की खरीद पर पितरों का आशीर्वाद बरसता है।

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