'सेक्स पावर' पाने के लिए ग्लेशियर में लगाई आग
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उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कीड़ा जड़ी (यारसागंबू) की अनियंत्रित खोज यहां की संवेदनशील पारिस्थितिकी के लिए खतरा बन रही है।
तीन हजार मीटर से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दबी कीड़ा जड़ी निकालने के लिए कई बार बर्फ में आग भी लगाई जा रही है। इससे ग्लेशियर और बुग्यालों (घास के मैदानों) की सेहत को गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
हर साल कीड़ा जड़ी की तलाश में जाने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।
किड़ा जड़ी की तलाश में आए हजारों लोग
अनुमान के मुताबिक इस साल चमोली जिले से 15 हजार और पिथौरागढ़ से पांच हजार से ज्यादा लोग कीड़ा जड़ी की तलाश में गए।
पहले इन क्षेत्रों में महिलाएं नहीं जाती थीं, अब बड़ी संख्या में ये भी जाने लगी हैं। तेज ध्वनि से भी प्रभावित होने वाली अतिसंवेदनशील पारिस्थितिकी को पूरी कवायद से कितना खतरा है, समझा जा सकता है।
सबसे बड़ी बात यह कि कीड़ा जड़ी की खोज में जाने वालों की संख्या को नियंत्रित करने और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में गए लोगों की गतिविधियों की मॉनीटरिंग की कोई व्यवस्था नहीं है।
क्या है कीड़ा जड़ी
निजमुला घाटी निवासी मोहन सिंह नेगी कहते हैं कि प्रतिबंध न होने से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हजारों ग्रामीण तंबू लगाकर रहते हैं। उनकी गतिविधियों से पर्यावरण को गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
इन क्षेत्रों में मिलती है कीड़ा जड़ी
जोशीमठ की नीती व माणा घाटी, तपोवन, करछौं, उर्गम, पाणा-ईराणी, झींझी, घुनी, रामणी, देवाल, वाण, कनोल।
हिमाच्छादित क्षेत्रों में 3 से 4 हजार मीटर की ऊंचाई बर्फ के नीचे एक कीड़ा पनपता है। जब मई माह में इन क्षेत्रों से बर्फ पिघल जाती है यह कीड़ा नष्ट होकर जड़ी का रूप ले लेता है।
लगभग पांच इंच लंबी यह जड़ी जमीन के बाहर एक सूखी जड़ की तरह दिखती है। वन विभाग ने सीमावर्ती क्षेत्रों के ग्रामीणों को कीड़ा-जड़ी के दोहन की छूट दी है।
कीड़ा जड़ी का काला कारोबार
कीड़ा-जड़ी का दोहन ग्राम पंचायतों के हाथों है। वन विभाग ग्रामीणों द्वारा इकट्ठा की गई कीड़ा-जड़ी को बाजार उपलब्ध कराता है।
लेकिन इसके समानांतर इसका काला बाजार भी विकसित हो गया है। दिल्ली, देहरादून, मेरठ के व्यापारी ग्रामीण युवाओं से सीधा संपर्क साधते हैं।
वे निकाली जड़ी ग्राम पंचायतों को न देकर अवैध तरीके से काले कारोबारियों को दे देते हैं। कारोबारी एक किलो जड़ी के सात लाख तक देते हैं, लेकिन काले बाजार में उतरने के बाद कीड़ा जड़ी कई गुना महंगी बिकने लगती है।
15 जुलाई तक चलता है काम
कीड़ा जड़ी को निकालने का काम अप्रैल के आखिरी हफ्ते से शुरू होकर 15 जुलाई तक चलता है।
मानसून की सक्रियता के बाद कीड़ा जड़ी निकालना मुमकिन नहीं होता। बुग्यालों और ग्लेशियर क्षेत्रों में की गई खुदाई के बाद तत्काल बारिश का सीजन और खतरनाक होता है।
क्योंकि खोदी परत तेजी से बह जाती है। इस सीजन में कीड़ा जड़ी की तलाश करने वाले नीचे सुरक्षित इलाकों में आ गए हैं।
कठोर कार्रवाई की मांग उठाई
जोशीमठ के नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष ऋषि प्रसाद सती बताते हैं कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में करीब साढे़ 11 हजार फीट की ऊंचाई पर कीड़ा-जड़ी दोहन के लिए कई लोग बर्फ पिघलाने के लिए आग तक लगा रहे हैं।
सती कहते हैं कि बर्फ पिघलाने के लिए लगाई आग के घातक नतीजे हो सकते हैं। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप रोकने के लिए कठोर योजना बनाने की मांग भी उठाई।
शासनादेश के तहत वन पंचायतों को निकाली गई कीड़ा-जड़ी की सामूहिक नीलामी करना होता है। इससे मिली राशि का पांच फीसदी हिस्सा गांव के विकास तथा शेष निकालने वाले को देने की व्यवस्था है लेकिन वर्तमान में ऐसा हो नहीं रहा है।
- राजीव धीमान, डीएफओ, बदरीनाथ वन प्रभाग, गोपेश्वर