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हिमालय पर सूखे का संकट, पहुंची खतरनाक घास
रजा शास्त्री/अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 15 Feb 2016 03:54 PM IST
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ग्लोबल वार्मिंग से जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र के जलस्रोतों और वनस्पतियों के लिए एक खतरा और पहाड़ चढ़ रहा है। मध्य हिमालयी क्षेत्र में गाजर घास के पहुंचने से यहां की वनस्पतियों और जलस्रोतों को और खतरा पैदा हो गया।
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जलवायु परिवर्तन से हिमालयी क्षेत्र के जंगलों में नमी कम हो रही है, गाजर घास इसे और कम कर देगी। एफआरआई के जलवायु परिवर्तन विभाग के शोध में पाया गया कि वातावरण में जैसे-जैसे कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ेगी गाजर घास मजबूत होकर और फैलेगी।
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हिमालयी क्षेत्र में गरमी बनी वजह
जो गाजर घास (पार्थेनियम) पहले मैदानी क्षेत्रों और समुद्र तल से अधिकतम हजार-डेढ़ हजार मीटर ऊपर तक पहुंच पाती थी, वह अब मध्य हिमालय के दो हजार से 2200 मीटर तक पैदा हो रही है। इसका ऊपर चढ़ने का क्रम जारी है।
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विज्ञानियों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी क्षेत्र के तापमान में भी गरमाहट बढ़ रही है, जिससे गाजर घास को अनुकूल वातावरण मिलेगा। इससे हिमालय क्षेत्र की वनस्पतियां नष्ट होंगी। गाजर घास के पानी अधिक सोखने से पहले से सूख रहे जलस्रोतों की स्थिति बिगड़ेगी।
इससे मिट्टी की नमी भी कम होगी, जिससे स्थानीय वनस्पतियों और खेती के साथ जीव भी प्रभावित होंगे। शोध के दौरान गाजर घास को चैंबर में रखकर कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ाई गई। विज्ञानियों का कहना है कि कार्बन की जितनी मात्रा बढ़ी गाजर घास ने उतना अधिक रिस्पांस दिया है। गाजर घास के बढ़ने से हिमालयी इको सिस्टम प्रभावित होगा।
शोध के लिए मिला संस्थान को अवार्ड
वन अनुसंधान संस्थान के जलवायु परिवर्तन विभाग के वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड बढ़ने पर गाजर घास की स्थिति पर देश के इस पहले शोध को 10वीं उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कांग्रेस-2015-16 में अवार्ड दिया गया है।
मध्य हिमालयी क्षेत्र तक पहुंची गाजर घास का और ऊपर बढ़ने का क्रम इको सिस्टम और जैव विविधता के लिए खतरा है। कार्बन जितना बढ़ेगा, इसके लिए अनुकूल होगा। इसे रोकने के तरीकों को खोजने के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं।
-डॉ. हुकुम सिंह, शोध कर्ता, वरिष्ठ विज्ञानी जलवायु परिवर्तन विभाग