बदले नियम, अब कैदी नहीं कर पाएंगे पैरोल का मिसयूज
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कैदियों को मिलने वाली पैरोल की सुविधा का दुरुपयोग रोकने के लिए नई व्यवस्था बनने जा रही है।
उत्तराखंड में इसके तहत दो महीने से ज्यादा के पैरोल की स्वीकृति मुख्यमंत्री की बजाय राज्यपाल के स्तर से होगी। इसके साथ ही पैरोल के लिए दो अलग-अलग नियमावली भी बनाई जा रही हैं, जिसमें अलग-अलग श्रेणी के कैदियों को पैरोल देने के नियम होंगे।
अभी तक किसी बंदी को पंद्रह दिन का पैरोल देने के लिए जिलाधिकारी अधिकृत होते थे, जबकि इसे एक माह तक बढ़ाने के लिए कमिश्नर को पावर होती थी। वहीं मुख्यमंत्री के स्तर पर इसे तीन माह तक बढ़ाने का अधिकार होता था।
हरीश रावत सरकार में बंदियों को धड़ल्ले से पैरोल दिया
वैसे तो परिवारीजनों के उपचार, मकान बनवाने या फिर खेती करने आदि से जुड़े कारणों के चलते पैरोल दिए जाने की व्यवस्था है, लेकिन पूर्व की हरीश रावत सरकार में जिस तरह से बंदियों को धड़ल्ले से पैरोल दिया गया, उससे इस व्यवस्था पर सवाल खड़े होने लगे।
हरीश रावत सरकार में चुनाव के ऐन पहले बड़ी संख्या में हत्या के जुर्म में सजा काट रहे दोषसिद्ध बंदियों को पैरोल पर छोड़ने का मामला भी सामने आया था। अमर उजाला ने पैरोल देने के तरीकों पर बड़ी शिद्त से सवाल उठाए थे, जिसके बाद चुनाव आयोग ने भी मामलों को संज्ञान में भी लिया था।
मामले में जनहित याचिका भी दाखिल हुई थी। इस पर हाईकोर्ट के स्तर से भी पैरोल देने के लिए उत्तर प्रदेश से पृथक नियमावली बनाने के निर्देश उत्तराखंड शासन को दिए गए थे। इसी के बाद से यह कवायद शुरू हुई है।
नियमावली में होंगे कुछ प्रमुख संशोधन
गृह विभाग के सूत्रों की मानें तो इसमें कुछ प्रमुख संशोधन होंगे, जिसमें तीन माह या उससे ज्यादा पैरोल देने का अधिकार राज्यपाल को दिया जाएगा। साथ ही ऐसे कैदी जिन्होंने अपनी सजा के खिलाफ ऊपर की अदालत में अपील की है, उनके लिए भी अलग नियमावली बनेगी।
पैरोल को लेकर दो अलग-अलग नियमावली बनाई जा रही हैं। अभी इसमें क्या-क्या प्रावधान किए जाएंगे, इस पर मंथन किया जा रहा है। जल्द ही इसे कैबिनेट से पास कराकर अमल में लाया जाएगा।
- डॉ. उमाकांत पंवार, प्रमुख सचिव (गृह)