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सीमा पर मरने वाले जवान शहीद नहीं, क्यों?

Sun, 03 May 2015 11:10 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 03 May 2015 11:10 AM IST
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no martyr status in military and paramilitary forces.

वे सरहदों और मुल्क की रक्षा में अपनी जान लुटा देते हैं, लेकिन कायदे-कानून का जाल-बट्टा देखिए उन्हें शहीद का दर्जा हासिल नहीं है। गृह और रक्षा मंत्रालय दोनों अधिकृत रूप से स्वीकार करते हैं कि शहीद शब्द को परिभाषित ही नहीं किया गया है।

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सेना में गनीमत यह है परिभाषा के बिना ही वे मारे लोगों को शहीद लिख उन्हें वीरता पुरस्कार देते हैं। साथ ही युद्ध अथवा सैन्य कार्रवाई के दौरान मरे लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरियों, मेडिकल, इंजीनियरिंग दाखिले में आरक्षण मिलता है। अर्द्ध सैनिक बलों को यह भी नसीब नहीं है।
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अर्द्धसैनिक बलों को गृहमंत्रालय के ताजा बयान से धक्का लगा है। इसके हवाले से केंद्र सरकार ने संसद में साफ किया है कि सेना या अर्द्ध सैनिक बलों के जवानों को शहीद का दर्जा देने का कोई सरकारी आदेश नहीं है। दरअसल, अर्द्धसैनिक बलों के संगठन चाहते हैं कि जिस तरह से सेना के शहीदों को लाभ दिए जाते हैं वैसे ही उन्हें मिले।

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गृह राज्य मंत्री ने दिया लोकसभा में बयान

no martyr status in military and paramilitary forces.

मंगलवार को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरन रिजीजू ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया कि सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स (सीएपीएफ) और असम राइफल्स की ओर से लड़ाई के दौरान मारे गए जवानों को शहीद का दर्जा देने की मांग की गई थी।

उन्होंने बताया कि 14 सितंबर 2011 को हुई सचिवों की बैठक में रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि शहीद शब्द को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है और वे रक्षा कर्मियों के लिए इस संबंध में कोई आदेश और अधिसूचना जारी नहीं कर रहे हैं। इसी तरह से अर्द्धसैनिक बल और असम राइफल में भी शहीद का दर्जा नहीं दिया जा सकता।

उत्तराखंड आपदा दौरान उठा था सवाल
जून 2013 में उत्तराखंड में आई दैवी आपदा में राहत बचाव कार्य के दौरान एयरफोर्स का हेलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। जिसमें वायुसेना और आईटीबीपी के 20 लोग मारे गए थे। वायुसेना के पांच लोगों को शहीद का दर्जा दिया गया जबकि आईटीबीपी के लोगों को मृत करार दिया गया।

इसके बाद पूर्व अर्द्धसैनिक संगठनों ने इसका भारी विरोध किया था, लेकिन केंद्र ने कोई आदेश जारी नहीं किया। इसके बाद से अर्द्धसैनिक बलों के संगठन लगातार इसकी मांग कर रहे हैं।

2013 में भी गृह मंत्रालय का यही था कहना

no martyr status in military and paramilitary forces.

अप्रैल 2013 में लोकसभा में आतंकवादी और नक्सली मुठभेड़ में मारे जाने वाले सीआरपीएफ जवानों को शहीद का दर्जा देने का सवाल आया था।

प्रश्नकाल के दौरान तत्कालीन गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने सदन में जवाब दिया था कि सरकार ने शहीद को कहीं परिभाषित नहीं किया है और वर्तमान में कोई सरकारी आदेश या अधिसूचना नहीं है कि सेवा के दौरान मारे जाने वाले सीआरपीएफ जवान को शहीद का दर्जा दिया जाएगा।

इनका है कहना
अर्द्ध सैनिक बल के जवान भी सेना के जवानों की भांति सीमा पर तैनात रहते हैं। आंतरिक सुरक्षा में नक्सल और आतंकवादी गतिविधियों के दौरान प्राण न्योछावर करते हैं। ऐसे में हम लगातार मांग कर रहे हैं कि यह सैन्य ऑपरेशनों में मारे जाने वाले अर्द्ध सैनिकों को भी सेना की भांति शहीद करार देकर बराबर की सहूलियतें दी जाएं। केंद्र शहीद का दर्जा देने संबंधी कोई आदेश नहीं होने की बात कर रहा है जो बेहद दुखद है।
-एसएस कोठियाल, पूर्व आईजी और पूर्व केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल कार्मिक संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष

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