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नंदकेशरी में अपनी नौ बहनों से मिलेंगी मां नंदा
चमोली जिले के चेपड़ों से सुधाकर भट्ट
Updated Tue, 26 Aug 2014 01:50 PM IST
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उत्तराखंड के चेपड़ों में कुरुड़ से चलकर देर शाम नंदा की डोली भी पहुंच गई। नौटी से आई राज छंतौलियां चेपड़ों में ही प्रधानों के यहां मल्ला खोला में हैं।
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मंगलवार को होगा यात्रा सबसे बड़ा उत्सव
दूसरी ओर कुरुड़ की नंदा डोली थोके दारों के तल्ला खोला में डेरा डाल लिया है। एक ही गांव में रहते हुए भी नंदा की इस डोली और नंदा राजराजेश्वरी की राज छंतौलियों का मिलन मंगलवार को नंदकेसरी में होगा। परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से इस यात्रा का मंगलवार को सबसे बड़ा उत्सव होगा।
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कुमाऊं से अल्मोड़ा की नंदा देवी, नैनीताल की नैना देवी, कुरुड़ की नंदा, नौटी से छंतौलियां, भराड़ी कपकोट से आई भराड़ी देवी, द्वाराहाट से आई नंदा का मिलन होगा। मंगलवार को नंदकेशरी में नंदा की नौ बहनों का मिलन होगा। कुलसारी से शुरू हुई राजराजेश्वरी नंदा की यात्रा सुनला, थराली, केदारबगड़, राड़ी बगड़, सौगांव होते हुए चेपड़ों पहुंची।
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पिंडर घाटी में आगे बढ़ रही नंदा पिंडर के स्वभाव के साथ खुद को बदल रही है। पिंडर के सहारे-सहारे आगे बढ़ रही श्रीनंदा राजजात अब केवल राज जात नहीं रह गई है। अब यह नंदा की अपनी जात है।
नंदकेशरी में मंगलवार को नंदा अपनी सभी बहनों से मिलेगी। गढ़वाल और कुमाऊं की देवियों के मिलन के साथ-साथ नंदकेसरी गढ़वाल और कुमाऊं के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मिलन का सबब भी बनेगा। कुलसारी से आगे बढ़ने के साथ ही पिंडर का बहाव और तेज हो गया है। पिंडर ने अब अपने अंदर और शक्ति समेट ली है। ठीक यही हाल अब नंदा का भी है।
इस बार भी काली के लिए नहीं हुई बलि
राजजात में कई परंपराएं टूट रही हैं तो कई नई बन रही है। कुलस्यारी में रविवार को देर रात कालिंका देवी की पूजा के दौरान कालिंका यंत्र नहीं खुला। इस बार भी काली को बलि नहीं चढ़ाई गई। बलि के बाद इस यंत्र को खोलने की परंपरा रही है। पर बदलाव की बयार के बीच बलि प्रथा का विरोध क्षेत्र में हो रहा है।
पिछली तीन जातों में भी यहां बलि इसी विरोध के कारण नहीं हो पाई थी। अमावस्या की रात को काली के मंदिर में हुई पूजा में सबके लिए दरवाजे खोल दिए गए। 2000 की जात में भी यह पूजा लोगों की नजरों से दूर रही थी। पर इस बार कोशिश पूजा में सारे देवी देवता और लोग शामिल हुए।
इतना जरूर है कि काली को बलि न देने पर अब इस क्षेत्र में एक साल के अंदर-अंदर यज्ञ का आयोजन होगा। काली नंदा की बड़ी बहन है और राज जात जब कुलस्यारी पहुंची है तो अमावस्या को काली मंदिर में पूजा की जाती है। रात को पूजा के दौरान कालिंका आई भी और उसने अपने लिए भेंट भी मांगी।
खुद कुलस्यारी के कई पुजारी बलि के पक्ष में थे। इनका तर्क था कि पूजा की परंपरा को निभाया जाना चाहिए। पर बाद में ये पुजारी भी मान गए। तय किया गया कि साल में एक बार यज्ञ का आयोजन दोष निवारण के लिए किया जाएगा। कालिंका यंत्र जमीन के अंदर है और बलि न होने के कारण इसे बाहर नहीं निकाला गया।
...और भी चौसिंगिया खाडू
राड़ी बगड़। यह भी कहा जा रहा है कि नंदा जात में एक नहीं और भी चौसिंगिया खाडू होंगे। सोमवार को कुरुड़ की नंदा डोली के साथ दो चौसिंगियां खाडू दिखाई दिए तो इस बात की पुष्टि हुई। फर्क था तो सिर्फ इतना कि ये खाडू सफेद हैं।
पर इनकी शान उतनी ही है जितनी काले रंग के चौसिंगिंया खाडू की। नंदा की डोली के साथ शामिल लोगों के मुताबिक इन खाडुओं को भी होमकुंड में छोड़ दिया जाएगा। माना जाता है कि चौसिंगिया खाडू तभी पैदा होता है जब कोई दोष होता है।