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शिव की परीक्षा में खरी उतर आगे बढ़ीं मां नंदा

Sun, 24 Aug 2014 12:39 AM IST
भगोती (चमोली) से सुधाकर भट्ट
भगोती (चमोली) से सुधाकर भट्ट Updated Sun, 24 Aug 2014 12:39 AM IST
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nanda raj jat yatra in bhagoti

मां नंदा को मायके से उनके ससुराल कैलास पहुंचाने की यात्रा नंदा राजजात शनिवार को अपने छठे पड़ाव पर पहुंच गई। लहलहाते खेतों के बीच से होती हुई 12 थानों की छंतोलियों को साथ लेकर मां नंदा कोटी गांव से लंबा सफर तय करने के बाद देर शाम भगोती गांव (चमोली जिले में स्थित) पहुंचीं तो यहां देवी का भव्य स्वागत हुआ।

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रविवार को केवर गदेरे से नंदा का ससुराल का क्षेत्र शुरू होगा। कैलास के लिए निकलीं मां नंदा शनिवार को शिव की परीक्षा में खरी उतरने के बाद ही आगे बढ़ पाईं। यात्रा भले ही 12 किमी की रही, पर बीच के गांवों घतौड़ा, नौलापानी, बमियाला, छेकुड़ा, कंडवाल होती हुई मां नंदा शाम तक तक भगोती पहुंच पाईं।
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सड़क मार्ग से कटे ये गांव अब भी अपने परंपरागत अंदाज में जी रहे हैं। नंदा के साथ-साथ चल रहे यात्रियों का स्वागत भी उसी अंदाज में छांछ, दही, सेब और नाशपती से कर रहे हैं।

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नंदा के गणों और दूतों के बीच मल्ल युद्ध

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यात्रा के छठे दिन कोटी से 10:35 पर बगोली लाटू की अगुवाई में नंदा पूजा-अर्चना के बाद रवाना हुई। कोटी से उतरने के बाद खड़ी चढ़ाई चढ़कर नंदा घतौड़ा गांव पहुंचीं। मान्यता है कि घतौड़ा में शिव ने नंदा की शक्ति परीक्षा के लिए अपने दूत भेजे थे।

नंदा के गण और शिव के इन दूतों के बीच यहां पर मल्ल युद्ध हुआ था। यह भी मान्यता है कि नंदा के रूप पर दैत्य मोहित हुए और नंदा ने उन्हें सबक सिखाने के लिए कई रूप धारण किए।

इस पर दैत्य आपस में भिड़ पडे़ और नंदा कैलास के लिए प्रस्थान कर गईं। बताया जाता है कि गांव के पास एक माल स्यामार नाम की जगह है जहां पर इन दैत्यों का वध हुआ था। घतौड़ा का यह छोटा सा गांव रावत और नेगियों का है।

घतौड़ा से करीब दो किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़ कर नंदा की यह यात्रा नौलापानी की धार पर पहुंचीं। धार में नौलापानी की महिलाओं ने नंदा का स्वागत किया। पहाड़ के नाच गानों के बीच यहां पर देवी के मांगल गीत गाए गए। नौलापानी से नीचे उतरकर भगवती नंदा बमियाला गांव के करीब पहुंचीं।

नंदा के मायके का आखिरी पड़ाव है भगोती

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यहां से हल्की चढ़ाई के साथ नंदा की यात्रा करीब पांच किमी का सफर तय कर झिंझौणी धार पहुंचीं। यहां बुढे़रा, मरघाटी गांव के लोग भी थे। तीनों गांवों के लोगों ने नंदा का भरपूर स्वागत किया। यहां से सीधी चढ़ाई चढ़ नंदा की यह यात्रा छेक्रुड़ा पहुंचीं। छोटे से बुग्याल से सटा यह गांव भगोती की धार का आखिरी गांव है।

यहां से उतरकर नंदा की यह जात कंडवाल गांव होते हुए देर शाम भगोती पहुंचीं। भगोती एक तरह से नंदा के मायके का आखिरी पड़ाव है। भगोती से कुछ दूरी पर केवर गदेरे पर नंदा के मायके का क्षेत्र समाप्त हो जाता है।

यहां नंदा को विदा करने के लिए आसपास के दर्जनों गांवों के लोग पहुंचते हैं। नंदा का मायके का मोह नहीं छूटता और नंदा की छंतोली यहां से आगे बढ़ने में इंकार सी करती लगती है। इस मौके पर नंदा को विदा करने वाली महिलाओं की आंखों में आंसू हैं।

मुंह में ससुराल का कष्ट भरा जीवन और मायके से बेटी को विदा करने का दर्द है। चमोली जिले में नौटी से शुरू हुई राजजात अब तक 62 किमी का सफर तय कर चुकी है।

ऐतिहासिक श्रीनंदा देवी राजजात की खास बातें

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मां नंदा को उनकी ससुराल भेजने की यात्रा है राजजात। मां नंदा को भगवान शिव की पत्नी माना जाता है और कैलास (हिमालय) भगवान शिव का निवास। मान्यता है कि एक बार नंदा अपने मायके आई थीं। लेकिन किन्हीं कारणों से वह 12 वर्ष तक ससुराल नहीं जा सकीं। बाद में उन्हें आदर-सत्कार के साथ ससुराल भेजा गया।

चमोली जिले में पट्टी चांदपुर और श्रीगुरु क्षेत्र को मां नंदा का मायका और बधाण क्षेत्र (नंदाक क्षेत्र) को उनकी ससुराल माना जाता है। एशिया की सबसे लंबी पैदल यात्रा और गढ़वाल-कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत श्रीनंदा राजजात अपने में कई रहस्य और रोमांच को संजोए है।

यात्रा में प्रमुख
-18 अगस्त से शुरू होकर 06 सितंबर, 14 तक चलेगी यात्रा
-चमोली के नौटी से यात्रा उच्च हिमालयी क्षेत्र होमकुंड पहुंचती है
-राजजात का समापन कार्यक्रम 07 सितंबर को नौटी में होगा

-20 दिन में बीस पड़ावों से होकर गुजरते हैं राजजात के यात्री
-280 किमी की यह यात्रा कई निर्जन पड़ावों से होकर गुजरती है
-आमतौर पर हर 12वर्ष पर होती है, इस बार 14 वें वर्ष में हो रही
-होमकुंड समुद्र तल से 17500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है

-इसलिए इस यात्रा को हिमालयी महाकुंभ के नाम से भी जानते हैं
-राजजात गढ़वाल-कुमाऊं के सांस्कृतिक मिलन का भी प्रतीक
-जगह-जगह से डोलियां आकर इस यात्रा में शामिल होती हैं

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