राजजात में तबाह हुआ उत्तराखंड का स्विटजरलैंड
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आस्था के पथ पर बढ़े लाखों डग लौट आए हैं। 14 साल बाद हुई मां नंदा राजजात यात्रा के सकुशल संपन्न होने पर श्रद्धालुओं से लेकर सरकार तक बेहद खुश है। लेकिन खुशियों और उत्साह के इस माहौल के बीच एक वेदना की टीस भी चुभने लगी है।
यह दर्द है बेदनी बुग्याल का। चमोली के आखिरी गांव वाण से करीब 14 किलोमीटर ट्रैक रूट पर स्थित बेदनी की जान है हरी घास। लेकिन राजजात के दौरान इस बुग्याल की घास को जो नुकसान पहुंचा है, उससे इसकी तस्वीर ही बिगड़ गई है।
हरी चादर कई जगह पीली पड़ गई है, जबकि कई जगह तो मिट्टी तक उधड़ चुकी है। करीब सवा लाख यात्रियों के ढाई लाख कदम, एक हजार से अधिक टेंटों और प्लास्टिक कचरे के ढेरों का बोझ झेलने के बाद बेदनी अब जिस हाल में है, माना जा रहा है कि अपने पुराने रूप में लौटने में उसे कम से कम पांच साल लग जाएंगे।
खास है बेदनी बुग्याल
समुद्र तल से 11004 फीट ऊंचाई पर स्थित बेदनी बुग्याल ब्रह्म कमल जैसे दुर्लभ पुष्पों, वैतरणी ताल और हिमालय की त्रिशूल और नंदा की घूंटी चोटियों के मनोरम नजारों के लिए देश-दुनिया में जाना जाता है।
वर्ष के छह माह यह बुग्याल बर्फ से ढका रहता है, मई में बर्फ पिघलने के बाद बर्फ के नीचे से हरी घास नुमायां होती है। इसके बाद अक्तूबर तक घास के नर्म मैदान सैलानियों को लुभाते हैं।
तंबुओं ने किया नुकसान
बेदनी में गढ़वाल मंडल विकास निगम (जीएमवीएन) ने 250, नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (निम) उत्तरकाशी ने 250 से अधिक बड़े टैंट लगाए थे। वीआईपी यात्रियों, आईटीबीपी, निम, एसडीआरआफ जवानों के अपने टैंट अलग थे।
इनके अलावा यात्रियों ने भी जहां-तहां अपने छोटे-बड़े टैंट लगा दिए थे। टैंट में पानी घुसने से बचाने के लिए चारों ओर गड्ढे खोदे गए, लेकिन टैंट हटाने के बाद गड्ढे भरे नहीं गए।
यात्री लापरवाह, सरकारी तंत्र बेसुध
बेदनी से यात्रा अगले पड़ाव को बढ़ी और पीछे बदहाली के निशान छोड़ गई। जीएमवीएन ने भी यात्रियों के निकलते ही अपने टेंट उखाड़कर वापस भेजने शुरू कर दिए, लेकिन जहां-तहां पड़ा कचरा साफ करने की जहमत नहीं उठाई गई।
दूसरी ओर, यात्रियों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति अधिक जागरूकता नजर नहीं आई। चंद यात्री जरूर ध्यान रख रहे थे कि बुग्याल में वे कचरा न छोड़ जाएं, लेकिन उखड़े हुए तंबुओं की जगह लगे थर्माकोल की प्लेटों, ग्लासों, प्लास्टिक की थैलियों, खाली बोतलों के ढेर बता रहे थे कि ऐसे लोगों की तादाद काफी कम थी।
भंडारा लगाकर यात्रियों को भोजन कराने वाले भी टेंट उठाकर चलते बने और पीछे छोड़ गए कचरे के ढेर।
राजजात यात्रा मार्ग और बुग्याल में फैले कचरे की सफाई के लिए वन विभाग को निर्देश दिया गया है। बुग्याल में यात्रियों ने कूड़ा, पॉलीथिन, कचरा छोड़ दिया है। वन अधिकारियों को अन्य विभागों से समन्वय बनाकर कचरे और अन्य फेंके सामान के निस्तारण की योजना बनाकर काम करने के लिए कहा है।
- दिनेश अग्रवाल, वन मंत्री
विदेशियों में दिखी चिंता
जर्मनी से आई 75 वर्षीय एलिजाबेथ वाण और आसपास के गांवों में महिला उत्थान और पर्यावरण संरक्षण पर काम कर रही हैं। बुग्याल में लोगों को गंदगी फैलाते देख वह हैरान रह गईं। बोलीं, यही हाल रहा तो खूबसूरत बुग्याल खत्म हो जाएगा। सरकार को इसके लिए पॉलिसी बनानी चाहिए।
एलिजाबेथ का कहना था कि यहां आने वाले लोगों को भी अपने साथ एक थैला रखना चाहिए, जिसमें खाने-पीने के सामान के खाली पैकेट, प्लास्टिक की बोतलें आदि वे इकट्ठा रख सकें। यह थैला बुग्याल में छोड़ने के बजाय वापस ले जाना चाहिए।
वहीं, बेदनी में छह माह तक दुकान चलाने वाले वाण गांव के दानू ने बताया कि पहली बार इस बुग्याल का ऐसा हाल देखा। बताया कि यहां कई विदेशी पर्यटक आते हैं, 15-20 दिन ठहरते हैं। लेकिन कभी यहां गंदगी नहीं फैलाते। जो भी कचरा होता है, उसे बैग में भरकर साथ ले जाते हैं।