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उत्तराखंड नगर निकाय चुनाव: दून में मेयर की कुर्सी के लिए भाजपा में मचा घमासान

Sun, 17 Dec 2017 01:30 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 17 Dec 2017 01:30 PM IST
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Nagar nikay chunav uttarakhand fight for mayor chair
bjp

देहरादून नगर निगम के मेयर पद के लिए भाजपा में घमासान मचा है। दावेदार जोर आजमाइश में जुटे हैं। दिग्गज नेताओं के साथ पोस्टर-बैनर के जरिये दबाव और माहौल बन रहा है। कई दावेदार पोस्टर-बैनरों से गायब हैं, लेकिन फील्ड में पूरी ताकत से मौजूद हैं।

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दावेदार अपने आकाओं के यहां रोज हाजिरी लगा रहे हैं। आखिर ये सब हो भी क्यों ना। उत्तराखंड के सबसे बड़े नगर निगम के मेयर की कुर्सी का जलवा ही कुछ ऐसा है। फिर, डबल इंजन की सरकार के जमाने में मिनी सरकार चलाने का मौका आखिर कोई क्यों छोड़ना चाहेगा।
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इसलिए लड़ाई दिलचस्प भी है और कठिन भी। अपनी-अपनी ताकत और कमजोरी के बीच भाजपा के कई दावेदार टिकट की दौड़ में शामिल हैं। हालांकि सब ये भी जानते हैं कि राह किसी की आसान नहीं है। आसानी से टिकट मिलने वाला नहीं है।
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-भाजपा में टिकट की लड़ाई में प्रदेश सचिव सुनील उनियाल ‘गामा’ की मजबूत स्थिति दिख रही है। इसका सिर्फ एक कारण है और वो है सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत कैंप से संबंधित होना। गामा विधानसभा चुनाव में सीएम की डोईवाला सीट पर उनके संयोजक रह चुके हैं। नगर निगम की राजनीति में पुराना दखल भी उनके पक्ष में जा रहा है। हालांकि जिस तरह से नगर निगम का दायरा बढ़ गया है, उसमें एक बडे़ वर्ग तक उनकी पहुंच अब भी नहीं बन पाई है। ये उन्हें देखना होगा।
सुनील उनियाल ‘गामा’

-भाजपा में उमेश अग्रवाल जाना-पहचाना नाम है। बीसी खंडूडी कैंप के साथ शुरू से जुडे़ रहे। हालांकि अब मजबूत राजनीतिक आका न होने का नुकसान झेल रहे हैं। फिर भी महानगर अध्यक्ष रहते हुए कार्यकर्ताओं के बीच अच्छी पकड़ बनाई है। चुनावी राजनीति के तौर-तरीके अच्छे से जानते हैं। 2013 में मेयर पद और 2017 में धर्मपुर विधानसभा सीट से टिकट कट चुका है। इसी को आधार बनाकर वे दावा ठोंक रहे हैं। हालांकि भाजपा के भीतर उनके विरोधियों की संख्या भी काफी है, जिनसे उन्हें निबटना होगा।
उमेश अग्रवाल

टिकट के अरमान, चाहिए ‘कमल’ निशान

Nagar nikay chunav uttarakhand fight for mayor chair
बीजेपी
भाजपा के प्रदेश महामंत्री नरेश बंसल का नाम विधानसभा चुनाव से लेकर राज्यसभा चुनाव तक में उम्मीदवार बतौर उछलता रहा है। ये अलग बात है, कि चुनावी राजनीति में वे बहुत प्रभावी तरीके से कभी सामने नहीं आ पाए हैं। मगर भाजपा संगठन में अपनी मजबूत स्थिति के कारण उनका नाम भी इस पद के मजबूत दावेदारों में शुमार है।
नरेश बंसल

भाजपा के टिकट के दावेदारों में व्यापारिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं में अनिल गोयल भी प्रमुख रूप से शामिल हैं। उनके साथ भी नरेश बंसल जैसी स्थिति मानी जाती है। यानी, विधानसभा चुनाव से लेकर राज्यसभा चुनाव तक में कई बार उम्मीदवार बतौर उनका नाम सामने आया है, मगर चुनावी राजनीति में सफलता उनसे दूर रही है। इसके बावजूद, मेयर पद पर उनका नाम इस बार भी सामने आ रहा है।
अनिल गोयल

भाजपा दून महानगर के अध्यक्ष रहने के कारण पुनीत मित्तल शहर के मिजाज, कार्यकर्ताओं की भावनाओं जैसी कई बातों को अच्छी तरह से जानते हैं। उनका सबसे मजबूत पक्ष उनके परिवार की आरएसएस की पृष्ठभूमि है। दून में संगठन को खड़ा करने में उनके परिवार का खासा योगदान रहा है। मित्तल प्रदेश कार्य समिति के सदस्य हैं। वरिष्ठ नेताओं से उनके अच्छे संबंध हैं, लेकिन दावेदारी को प्रभावी बनाने की चुनौती उनके सामने भी है।
पुनीत मित्तल

उत्तराखंड राज्य आंदोलन की प्रमुख नेत्री सुशीला बलूनी भाजपा में भी हर किसी की दीदी हैं। राज्य के पहले नगर निगम चुनाव 2003 में मेयर पद पर यूकेडी प्रत्याशी थीं, लेकिन हार गईं। साफ-सुथरी छवि है, लेकिन चुनावी राजनीति में बहुत सफल नहीं रही हैं। इसके अलावा बढ़ती उम्र और सेहत भी कमजोर पक्ष बनकर उभर रहे हैं। फिर भी यदि मेयर पद महिलाओं के लिए आरक्षित होता है, तो मजबूत दावेदार होंगी।
सुशीला बलूनी

भाजपा नेत्री विनोद उनियाल और उनका पूरा परिवार भाजपा-संघ के रंग में शुरू से रंगा रहा है। पहले नगर निकाय चुनाव 2003 में पार्टी ने उन्हें मेयर का टिकट दिया था, हालांकि वे हार गई थीं, लेकिन पूरे पांच साल कानूनी दांव-पेंच में उन्होंने मेयर मनोरमा शर्मा को उलझाकर रखा था। उनियाल की उम्मीदें भी इस बात पर टिकी है कि यदि सीट महिला आरक्षित होती है, तो पूर्व उम्मीदवार होने से उनका दावा मजबूत होगा।
विनोद उनियाल

भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष नीलम सहगल ने महिला कार्यकर्ताओं के बीच खास पहचान बनाई है। विधानसभा चुनाव में वह कई बार टिकट मांग चुकी हैं। महिलाओं के चुनावी प्रतिनिधित्व के सवाल पर मुखर रही हैं। नगर निगम की चुनावी राजनीति में भी सक्रिय रह चुकी हैं। उनकी दावेदारी की मजबूती भी इस बात पर काफी हद तक टिकी है कि ये सीट सामान्य रहती है या फिर महिला आरक्षित होती है।
नीलम सहगल

भाजपा नेता रविंद्र कटारिया वर्ष-2012 के विधानसभा चुनाव में राजपुर सीट पर पार्टी प्रत्याशी रह चुके हैं। इस बार के चुनाव में उनका टिकट काट दिया गया था। कटारिया शांत रहे, तो इसके पीछे उनके एडजस्टमेंट के वायदे ने काम किया। ये एडजस्टमेंट अब मेयर का टिकट होगा या नहीं, कहना मुश्किल है। वैसे, खुद रविंद कटारिया भी उन्हीं स्थिति में चुनाव लड़ना चाहेंगे, जबकि मेयर की सीट आरक्षित घोषित हो।
रविंद्र कटारिया
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