फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   muslims life after terrorist attack.

आतंकी हमले के बाद मुसलिमों के दर्दनाक हालात

Sat, 27 Dec 2014 10:06 AM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sat, 27 Dec 2014 10:06 AM IST
विज्ञापन
muslims life after terrorist attack.

‘अफगानिस्तान में तालिबानी कहर, 9/11 की वारदात, इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) का आतंक और अब पाकिस्तान में पेशावर में मासूमों का कत्ल।

विज्ञापन


पिछले डेढ़ दशक में दुनियाभर में जिस तरह जेहाद के नाम पर आतंकी वारदातें बढ़ी हैं, उन्होंने दूसरे समुदायों के लोगों से कहीं अधिक नुकसान मुसलिम समाज के ही अमनपसंद लोगों को पहुंचाया है। आज स्थिति यह हो चुकी है कि मुसलिम नाम सुनते ही लोग शक की नजरों से देखने लगते हैं।
विज्ञापन


घर लेना हो या बच्चे का स्कूल में दाखिला कराना हो, इतने सवाल पूछे जाते हैं कि कदम खुद लौटने लगते हैं। इस्लामिक सोसायटी ऑफ नीदरलैंड के अध्यक्ष मोहम्मद खालिद ने कुछ इस तरह विदेशों में रह रहे मुसलिमों का दर्द बयां किया।

विज्ञापन
विज्ञापन

सामान्य मुसलिम समाज के लिए पराई हुई दुनिया

muslims life after terrorist attack.

गुरुवार को दून में एक निजी कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे मोहम्मद खालिद और महिला संगठन ‘अल निशां’ की संयोजक फरहत खान से अमर उजाला ने बात की। बातचीत शुरू हुई तो मसला आतंकवाद पर जा टिका।

खालिद और फरहत ने बताया कि मुसलिम आतंकी संगठनों की वजह से दुनिया सामान्य मुसलिम समाज के लिए भी पराई होती जा रही है। नीदरलैंड का जिक्र करते हुए कहा कि वहां के लोग चाहते हैं कि वहां बसे मुसलिम यूरोप से बाहर चले जाएं।

कहा कि यह सिर्फ एक देश की बात नहीं है। सारी दुनिया में मजहब बदनाम हो रहा है और कौम परेशान। कहा कि आतंकी इसलाम और मुसलमान दोनों के दुश्मन हैं।

खान और खालिद ने कहा कि इसलामिक सोसायटी ने इस्लामाबाद में घटना का विरोध किया था। जोर दिया कि अब कौम के लोगों को एकजुट होकर आतंकियों की मुखालफत करनी चाहिए, यह बताना चाहिए कि इसलाम कभी आतंक, जुल्म और मासूमों के कत्ल की इजाजत नहीं देता है।

नहीं बनाने देते मसजिद

muslims life after terrorist attack.

वह बताते हैं कि 40 साल पहले नीदरलैंड में कोई मसजिद नहीं थी। वहां की सरकार को प्रार्थनापत्र दिया गया तो पादरी खुद उनके पास आए और खुशी से कहा कि आइए कई चर्चों के भवन खाली हैं, मुसलिम वहां नमाज अदा कर सकते हैं।

मुफ्त का भवन न लेने पर पादरियों ने प्रतीक के तौर पर बस एक यूरो देने के लिए कहा। लेकिन अब हालात ये हैं कि मसजिद बनाने की कोशिश करते ही लोग कोर्ट से स्टे आर्डर ले आते हैं। मसजिद निर्माण मुश्किल में पड़ जाता है।

‘बच्चे का नाम बदल दीजिए’
खालिद ने बताया कि मुसलिम नाम सुनते ही लोगों के चेहरों पर शिकन उभर आती है। अपना अनुभव सुनाते हुए बोले, बच्चे का दाखिला कराने स्कूल गए तो अध्यापक ने कहा कि बच्चे का नाम ईसाई की तरह रखिए। बड़ी मुश्किल से दाखिला हो पाया।

पाक में परेशान हैं मुहाजिर

लोग बताते हैं कि 1947 में भारत से जो मुसलमान पाकिस्तान चले गए थे, उन्हें आज भी रुतबा और कौमी प्यार हासिल नहीं हो सका है। बताते हैं कि उन लोगों को आज भी ‘मुहाजिर’ पुकारा जाता है। दोयम नागरिक के तौर पर उनसे भेदभाव, बर्ताव किया जाता है। वे परेशान रहते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed