पलायन के दर्द से कराह रहा पहाड़, 2.80 लाख घरों पर ताले
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उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में दो लाख 80 हजार 615 मकानों पर ताले पड़े हुए हैं। यह महज अनुमान नहीं, बल्कि हाल में अर्थ एवं सांख्यिकी विभाग द्वारा जारी ‘सांख्यिकी डायरी’ के आंकड़ों का सच है।
हाल ही देहरादून आए गृह मंत्री राजनाथ सिंह के सामने कैराना में हिन्दुओं के कथित पलायन के हवाले से पहाड़ों से पलायन का मुद्दा उठा था। अमर उजाला ने इसके मद्देनजर कुछ सरकारी और गैर सरकारी आंकड़े खंगाले तो पता चला कि राज्य बनने के बाद 16 साल में 32 लाख लोगों ने पहाड़ से अपना घर छोड़ दिया है। यह आंकड़ा ‘पलायन एक चिंतन’ गैर सरकारी संस्था ने जुटाया है।
देहरादून प्रवास में केंद्रीय गृह मंत्री ने इस दिशा में ठोस कदम उठाने पर जोर कहा देते हुए कहा था कि सीमावर्ती राज्य में गांव के गांव खाली होना देश की सुरक्षा के लिहाज से भी गंभीर मसला है। उन्होंने राज्य सरकार से रिपोर्ट तलब करने की भी बात कही। मगर इस पर कुछ होगा, जानकारों को यकीन नहीं है। उनका कहना है कि 16 सालों से तमाम लोगों ने राज्य और केंद्र स्तर पर ऐसी चिंता जताई मगर पलायन थमने की बजाय बढ़ता गया।
पद्मश्री डॉ. अनिल जोशी की गांव बचाओ यात्रा के दौरान अमर उजाला ने इस मुद्दे को गंभीरता से उभारा तो सरकार ने पलायन रोकने के लिए कार्ययोजना तैयार की, मगर यह कागजों से बार नहीं निकल सकी। सरकार ने पलायन रोकने को गांवों की आर्थिकी से जोड़ने की कार्ययोजना तैयार करने का निर्णय लिया। पालिसी प्लानिंग ग्रुप को गांवों में मूलभूत सुविधाएं देने के साथ वहां की आर्थिकी को सीधे बाजार जोड़ने की सुविधाएं देने का जिम्मा दिया गया था। पालिसी प्लानिंग ग्रुप ने मामले पर बैठक कर सुझाव भी दिए हैं, जो अभी तक विचार विमर्श के स्तर पर हैं।
सामरिक दृष्टि से बेहद गंभीर मसला
रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल एमसी भंडारी (रि) चीन सीमा से लगे क्षेत्र में गांवों के वीरान होने को सामरिक दृष्टि से बेहद गंभीर मसला मानते हैं। वे कहते हैं कि हमारी पहली रक्षा दीवार ही ध्वस्त हो रही है। यह भविष्य के लिए बेहद खतरनाक है। इस मुद्दे पर गांव बचाओ यात्रा के संयोजक डॉ. अनिल जोशी का कहना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के साधन विकसित न हो पाना सीधे तौर पर पलायन के मुख्य कारण हैं।
बिना इनके इंतजाम के पलायन रुकने से रहा। ‘पलायन एक चिंतन’ संस्था के रतन सिंह असवाल के मुताबिक, प्राथमिक शिक्षा का अभाव, सरकारों द्वारा खेती की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए कुछ न करना, स्वास्थ्य और रोजगार के सीमित साधन पहाड़ से पलायन की मूल वजह हैं। सरकार इसके लिए फिक्रमंद भी नजर नहीं आती।
न दौड़ न दौड़, तौं उंदरियूं का बाठा...
पहाड़ से पलायन का दर्द उत्तराखंड के लोकगीतों में भी महसूस किया जा सकता है। प्रसिद्ध लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने पलायन की व्यथा को कुछ यूं शब्द दिए हैं- ‘न दौड़ न दौड़, तौं उंदरियूं का बाठा, उंदारियूं का बाठा....’ (नीचे जाने के रास्तों की तरफ मत दौड़, मत दौड़)।
पहाड़ पर खाली मकानों की स्थिति
जिला ---- खाली घरों की संख्या
उत्तरकाशी - 12844
पौड़ी - 38764
चमोली - 20765
टिहरी - 37450
देहरादून (पहाड़ी क्षेत्र) - 46489
रुद्रप्रयाग - 11609
पिथौरागढ़ - 25904
अल्मोड़ा - 38568
नैनीताल - 23939
बागेश्वर - 11556
चंपावत - 12727
(अगर आपके पास भी ऐसी कोई समस्या है तो यहां संपर्क करें... 8392945705)
Published By : Nirmala Suyal