महाकुंभ 2021 : 1867 के कुंभ के आयोजन में काम आई सख्ती, स्वास्थ्य विभाग को दी गई थी जिम्मेदारी
पहला अवसर था जब 1867 के कुंभ के आयोजन की जिम्मेदारी सरकार ने स्वास्थ्य विभाग को दे दी। इससे पहले स्थानीय प्रशासन यह काम करता रहा था। नतीजा यह हुआ कि पूरा जोर साफ-सफाई और चिकित्सा पर रहा।
पुलिस ने भीड़-भाड़ एक स्थान पर बढ़ने से रोकने के लिए तीर्थयात्रियों को लाइन लगवाकर घाटों पर जाने दिया। सख्ती इतनी कि जो लाइन में एक बार लग जाए फिर बीच रास्ते उसे वापस नहीं लौटने दिया जाता था। स्नान के बाद तीर्थयात्रियों को वापस भी लाइन से ही भेजा गया। संतों-अखाड़ोें के साथ भी यही किया गया।
एक स्थिति ऐसी भी आई कि प्रमुख स्नान वाले दिन पुण्यकाल में अचानक भारी भीड़ उमड़ पड़ी। पुलिस ने किसी तरह स्थिति को घाटों पर नियंत्रित कर लिया। तीर्थयात्रियों से सफाई के नियमों का पालन सख्ती से कराया गया। शौचालय के काफी इंतजाम किए गए थे। पुलिस इतनी सक्रिय थी कि रास्ते में या खुले में कोई शौच के लिए जा नहीं सकता था। जगह जगह कूड़ेदान रखे गए थे।
घाटों पर गंदगी नहीं एकत्र होने दी जा रही थी। कैंपों में रहने वाले साधु-संतों और यात्रियों को भी कहा गया कि वे अपने यहां स्थित शौचालय का ही प्रयोग करें। किसी को भी खुले में नहीं बैठने दें। जो भी खुले में दिखता था, उसे पुलिस फटकार कर लौटा देती थी। नतीजतन मेला संक्रमणमुक्त रहा।
(स्रोत- The Imperial Gazette of India British Medical Journal Vol v )
डब्बल्यूएचओ ने बनाई थी गाइडलाइन
हरिद्वार ही नहीं, प्रयागराज के भी कुंभ, हज और अन्य धार्मिक मेलों में अक्सर होती रही भगदड़, महामारियों और अन्य हादसों को रोकने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 29 व 30 अप्रैल को जेनेवा में टेक्निकल वर्कशाप का आयोजन किया था।
इसमें दुनिया भर के 30 उन विशेषज्ञों ने भाग लिया था जिन्हें ऐसे आयोजन में किसी न किसी रूप में काम करने अनुभव था।
इन सभी से यह फीडबैक लिया गया कि गड़बड़ी आखिर कहां और किस स्तर पर होती है। इसे दूर करने के क्या उपाय किए जाने चाहिए? वर्कशाप के अंत में गाइडलाइन बनाई गई। हरिद्वार कुंभ में भी इसी का ध्यान रखा जाना स्वाभाविक है।