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महादेवी की स्मृतियां सहेजे है रामगढ़ का ‘मीरा कुटीर’
अमरनाथ/ अमर उजाला, हल्द्वानी
Updated Fri, 11 Sep 2015 02:33 PM IST
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ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित महादेवी वर्मा साहित्य सृजन के साथ-साथ अच्छा मार्गदर्शन भी करती थीं। पहाड़ के प्रति उनके बेहद लगाव का नतीजा रहा कि उनके द्वारा पढ़ाई गई रेवती जोशी, हंसी जोशी, संतोष, गीता शाह जैसी पहाड़ की कई लड़कियां आगे चलकर शिक्षिका बनीं।
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यही नहीं उनका नौकर अनपढ़ था, लेकिन उनकी प्रेरणा से उसने एमए पास कर लिया था। उन्होंने अपने संस्मरण में पहाड़ की कई कन्याओं की व्यथा कथा को बेहद सहृदयता से बयां किया है।
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रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत बताते हैं कि वर्ष 1936 में महादेवी वर्मा ने रामगढ़ के उमागढ़ गांव के देवीधार में अपने ग्रीष्मकालीन प्रवास के लिए भवन बनवाया, जिसे उन्होंने ‘मीरा कुटीर’ नाम दिया। 1965 तक वह हर गर्मियों में रामगढ़ आती थीं।
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अपने संग्रह ‘पथ के साथी’ में उन्होंने लिखा है ‘हिमालय के प्रति मेरी आसक्ति जन्मजात है। उसके पर्वतीय अंचलों में भी मौन हिमानी और मुखर निर्झरों, निर्जन वन और कलरव भरे आकाश वाला रामगढ़ मुझे विशेष रूप से आकर्षित करता रहा है।’
वह साहित्य सृजन के साथ-साथ समाज सेवा के साथ शिक्षण भी करती थीं। अपने घर के पास स्थित प्राइमरी पाठशाला में वह बच्चों को नियमित पढ़ाती थीं। उन्होंने निरंतर रहकर यहां की कई महिलाओं को चेतनाशील और आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाया। बताया जाता है कि वह रामगढ़ जैसी जगह से हर साल अपने साथ एक-दो लड़कियों को पढ़ाने के लिए इलाहाबाद ले जाती थीं, जिनमें से अधिकांश पढ़-लिखकर अध्यापिका बनीं।
श्री रावत बताते हैं कि पहाड़ में उनके सानिध्य में ऐसे कई चरित्र आए, जिनकी व्यथा-कथा ने उन्हें उनकी रचनाओं के जरिए अजर-अमर कर दिया। चाहे वह डोटियाल संज्ञाधारी पर्वतीय कुली जंगबहादुर हो या फिर रामगढ़ की अल्हड़ लछमा। नैनीताल में वर्षों बाद मिली बालसखी बिट्टो की व्यथा-कथा भी महादेवी को सालती रही।
पैंतीस वर्ष का दीर्घ वैधव्य पार कर वृद्ध वर के लिए पुन: स्वयंवरा बनने वाली वह दुर्बल और थकी सी स्त्री उनके लिए साकार विस्मय बन गई थी।
दूसरी तरफ मुक्त हंसी से भरी पहाड़ी युवती ‘लछमा’ महादेवी को पहली मुलाकात में पहाड़ी और हिंदी खिचड़ी में उन्हें अपना परिचय देती- ‘हमारे लिए क्या डरते हो! हम क्या तुम्हारे जैसे आदमी हैं! हम तो हैं जानवर!‘ पहली बार लछमा को देखकर महादेवी के मन में उसे प्रयाग ले जाकर पढ़ाने-लिखाने का विचार उठा था, पर प्रस्ताव के उत्तर में लछमा ने अपने जीर्ण-शीर्ण घर की ओर देखकर सिर झुका लिया।
महादेवी ने अपने संस्मरण में लछिमा के बारे में लिखा है कि पर्वत की यह कन्या जितनी निडर है, उतनी ही निश्चल। ‘स्मृति की रेखाएं’, ‘अतीत के चलचित्र’ और ‘मेरा परिवार’ पुस्तक में निरंतर जिज्ञासाशील महादेवी ने स्मृति और मानवता के आधार पर जीवन के विविध रूपों को चित्रित कर पहाड़ के उन पात्रों को अमर कर दिया है, जो समाज में उपेक्षित थे।
यहां मेरे बाबा से महादेवी जी के अच्छे संबंध थे। मेरे पिताजी उनके मुंहबोले भाई थे। इसलिए हम उन्हें बुआजी कहते थे। रामगढ़ के लोगों से उन्हें बेहद लगाव था। वह मुझे रामगढ़ से प्रयाग स्थित महिला विद्यापीठ ले गईं, जहां से मैंने हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी की। वहां उन्हें गुरुजी कहा जाता था। महादेवी वर्मा को जिस प्राकृतिक सौंदर्य ने रामगढ़ की ओर खींचा था वह अब यहां नहीं दिखता।
- रेवती जोशी, (उम्र-75 साल) शिक्षिका (रिटायर्ड), जीजीआईसी, उन्नाव (यूपी)