हरिद्वार कुंभ 2021ः मुगल बादशाहों का भी आकर्षण रहा है हरिद्वार कुंभ, पढ़ें अद्भुत इतिहास
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कुंभ मेलों पर तैमूर और औरंगजेब जैसे लुटेरों ने बेशक हरिद्वार को लूटा हो, लेकिन कई मुगल बादशाहों और इतिहासकारों ने भव्य मेले का आनंद भी उठाया। 1608 में यूरोपियन यात्री टॉम कारियट का कुंभ विवरण पढ़कर 1620 के कुंभ में जहांगीर स्वयं हरिद्वार आकर रहा।
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हालांकि उसे यहां का मौसम रास न आया और कुछ ही दिनों में वह कांगड़ा चला गया। तैमूर का इतिहासकार शरफुरुद्दीन 1398 के कुंभ में हरिद्वार आया। उसने हिंदुओं के सबसे बड़े मेले को आईनी किताब में दर्ज किया। शफुरुद्दीन ने हरिद्वार का नाम तब कुपिला लिखा।
गजनवी के समय में इतिहासकार अबु रिहान ने हरकी पैड़ी की चरण पादुका पर नागा संन्यासियों के स्नान का विवरण लिखा। अकबर ने तो अपनी टकसाल ही हरिद्वार में बनाई थी। उसका प्रसिद्ध इतिहासकार अबुल फजल 16वीं शताब्दी में कुंभ मेला देखने आया। गंगा और मेले का वर्णन उसने आईने अकबरी में किया।
अकबर अपने पीने और हिंदू महारानियों के लिए गंगाजल हरिद्वार से ही मंगाता था
अबुल ने मायापुरी और हरिद्वार दोनों नामों का जिक्र किया। 1776 में मुगल सम्राट शाह आलम ने तो कुंभ लूटा, लेकिन इतिहासकार जमीयत खान ने कुंभ की धार्मिकता तथा साधुओं की संख्या का लंबा उल्लेख जमीयतनामा में किया।
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अकबर के इतिहासकार मिर्जा उमर भी जयपुर नरेश राजा मानसिंह के साथ कुंभ में आए। उसने मानसिंह के अखाड़ों में जाने का उल्लेख किया। मानसिंह ने माया देवी के दर्शन किए। यह सर्वविदित है कि अकबर अपने पीने और हिंदू महारानियों के लिए गंगाजल हरिद्वार से ही मंगाता था।
इसके लिए हाथी सवार दस्ता बनाया गया था। अकबर की राजपूत पत्नियां कुंभ स्नान करने हरिद्वार आती थीं, जिनके लिए श्यामपुर मार्ग पर महल बनवाया गया था। वह महल आल्हा-ऊदल के किलों के साथ ध्वस्त हो चुका है।