महामहिम हम पर भी करिए रहम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
राजनीतिक पहुंच या फिर ख्यातिलब्ध आजीवन सजायाप्ता कैदियों पर तो शासन मेहरबान है। लेकिन खुली जेल में 14 साल से ऊपर की सजा काट चुके उन 113 बंदियों की सजा माफी पर गौर नहीं किया जा रहा है, जो पिछले कई वर्षों से शासन में सजा माफी की गुहार लगा रहे हैं।
इतना ही नहीं इन बंदियों में उत्तराखंड के आठ बंदी ऐसे हैं, जिनकी उम्र 50 वर्ष से ऊपर हो गई है। बीते दिन बागश्वर के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष जवाहर सिंह परिहार को राज्यपाल द्वारा रिहा किए जाने से इन बंदियों में भी रिहाई की उम्मीद जग गई है।
उत्तर भारत की एकमात्र संपूर्णानंद शिविर (खुली जेल) में वर्तमान में 148 बंदी आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं।
इनमें यूपी के 95 और उत्तराखंड के 53 बंदी हैं। यूपी के 95 में से 94 बंदी 14 साल से ऊपर की सजा काट चुके हैं और कई बंदियों की उम्र भी 50 से ऊपर है।
इसके अलावा उत्तराखंड के टिहरी, नैनीताल, देहरादून, चंपावत, हरिद्वार, पौड़ी, बागेश्वर समेत सभी जिले के 53 बंदियों में से 19 बंदी 14 साल से ऊपर की सजा काट चुके हैं। इन बंदियों में 11 बंदी 34 से 50 साल उम्र के हैं और आठ बंदी 50 से 64 साल के हैं।
सालों से शासन में माफी के लिए फाइलें लंबित
50 से ऊपर उम्र के मूल निवासी चंपावत और हाल निवासी ऊधमसिंह नगर जिले के ईश्वरी राम पुत्र जीत राम (60), पिथौरागढ़ निवासी पुष्कर दत्त (50) पुत्र धर्म दत्त और किशन राम (53) पुत्र मोतीराम, ऊधम सिंह नगर जिले के हस्मत (54) पुत्र मनफूल खां व वीरन लाल (60) पुत्र हरचरन लाल, बागेश्वर जिले के शिव सिंह (55) पुत्र माधव सिंह एवं रंजीत लाल (64) पुत्र घप्पन लाल हैं।
इनकी कई वर्षों से शासन में सजा पूर्व माफी के लिए फाइलें लंबित हैं। लेकिन इस ओर अब तक शासन ने कोई ध्यान नहीं दिया। इससे बंदियों और उनके परिवारों में निराशा है।
उन्होंने उत्तराखंड और यूपी के राज्यपाल से रिहाई की गुहार लगाई है। इधर, वरिष्ठ जेल अधीक्षक मनोज कुमार आर्य ने बताया कि यूपी और उत्तराखंड के सभी 148 बंदियों की रिहाई की फाइलें संबंधित जिलाधिकारियों को भेजी गई हैं।
यह है रिहाई के आवेदन की प्रक्रिया
कैदियों को रिहा करने का अधिकार राष्ट्रपति और राज्यपाल को हैं। 14 वर्ष से ऊपर की सजा काटने वाले कैदियों की सजा पूर्व माफी के लिए 1938 के प्रोवेशन एक्ट के अंतर्गत फार्म (ए) भरा जाता है और जेल मैनुअल का पैरा 198 के तहत नॉमिनल रोल पर फाइल 14 साल से ऊपर की सजा काटने वाले कैदियों के संबंधित जिलों के जिलाधिकारियों को भेजी जाती है।
वहां से फाइल को अनुमोदित कर आईजी कारागार और फिर शासन के पास भेजा जाता है। शासन स्तर पर गठित कमेटी इस पर निर्णय करती है।
क्या है रिहाई का नियम
सीआरपीसी की धारा 433ए के तहत सरकार को 14 साल से ऊपर की सजा भुगत चुके कैदी को रिहा करने का अधिकार दिया गया है। इस अधिकार के तहत ही राष्ट्रपति या राज्यपाल कैदियों को रिहा करते हैं।
इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 161 सपठित दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 432 की शक्तियों का प्रयोग करते हुए दोषसिद्ध बंदी की भुगती गई सजा को पर्याप्त मानते हुए उसे रिहा किया जा सकता है।