नैनीताल में एशिया का सबसे बड़ा टेलीस्कोप, पढ़ें खासियत
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नैनीताल के देवस्थल में जल्द ही एशिया का सबसे बड़ा टेलीस्कोप काम करने लगेगा। करीब 150 करोड़ रुपए की लागत से 3.6 मीटर व्यास की यह दूरबीन लगाई जा रही है।
भारत-बेल्जियम की साझा पहल पर टेलीस्कोप केंद्र का ढांचा तैयार हो गया है, अब दूरबीन की स्थापना का कार्य शुरू हो गया है। अगले छह महीने में इसे शुरू करने के लिए दोनों देशों के वैज्ञानिक, इंजीनियर व तकनीकी विशेषज्ञ जुट गए हैं।
प्रोजेक्ट मैनेजर डॉ. बृजेश कुमार ने बताया कि बुधवार को बेल्जियम से इंजीनियर जोनाथन व उनकी पांच सदस्यीय टीम देवस्थल पहुंच गई है।
बीते दिवस वह स्वयं एरीज के कार्यवाहक निदेशक डॉ. वहाबउद्दीन, डॉ. शशिभूषण पांडे, डॉ. अमितेष ओमर के साथ देवस्थल गए थे, जहां टेलीस्कोप की स्थापना के लिए निर्माण कार्य पूरा हो गया है।
छह माह में काम करने लगेगा टेलीस्कोप
डॉ. बृजेश ने बताया कि मशीनों को सेट करने और तकनीकी परीक्षण के बाद अगले छह माह में टेलीस्कोप काम करने लगेगा। यह एशिया का सबसे बड़ा रिसर्च टेलीस्कोप होगा।
इसकी खास बात यह है कि इसका स्ट्रक्चर, इनक्लोजर, कोटिंग प्लांट आदि सभी देश में ही तैयार किए गए हैं, जबकि लेंस बेल्जियम में बनाया गया है।
विभिन्न स्टेज में टेस्टिंग के बाद इसकी लांचिंग की जाएगी। नैनीताल के पास आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज पहले से ही स्थापित है।
एरीज फिलहाल अमेरिका में स्थापित होने वाला विश्व का विशाल टीएमटी (थर्टी मीटर टेलीस्कोप) निर्माण में सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य कर रहा है।
संस्थान की ओर से वर्ष 2010 में देवस्थल में 1.3 मीटर व्यास का टेलीस्कोप स्थापित किया गया था। इसी क्रम में एशिया का सबसे बड़ा 3.6 मीटर व्यास का टेलीस्कोप लगाए जाने के प्रयास चल रहे थे।
नए ग्रहों की खोज में मिलेगी मदद
वैज्ञानिकों के मुताबिक टेलीस्कोप स्थापना के बाद नए ग्रहों की खोज, तारों की उत्पत्ति, तारों के मैग्नेटिक फील्ड, तारों के आसपास की धुंध (डेबरी) समेत आकाशगंगा व ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकेगी।
नैनीताल से 60 किमी दूर है विज्ञान का मंदिर
देवस्थल नैनीताल से 60 किमी दूर स्थित है। भवाली, पदमपुरी, धानाचूली से ओखलकांडा ब्लाक के जालापानी क्षेत्र से महज 3 किमी दूरी पर प्राचीन शिव मंदिर के समीप ही यह विज्ञान का मंदिर स्थापित किया गया है।
वैज्ञानिक दृष्टि से पांच किमी क्षेत्र में ऊंची पहाड़ियां न होने, आर्द्रता आदि विभिन्न वैज्ञानिक मानकों को ध्यान में रखकर 1980 में इस स्थल का चयन किया गया। 4.26 हेक्टेयर में फैला देवस्थल समुद्र तल से 2500 मीटर ऊंचाई पर स्थित है।