फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   inspirational folk of dehradun

प्रेरणा देता है यहां का लोक संगीत

Wed, 07 Aug 2013 01:02 PM IST
देहरादून/इंटरनेट डेस्क
देहरादून/इंटरनेट डेस्क Updated Wed, 07 Aug 2013 01:02 PM IST
विज्ञापन
inspirational folk of dehradun

उत्तराखंड के लोक जीवन में अलग ही ताल और लय है जिसकी छाप यहां के लोकगीत एवं लोकनृत्यों में साफतौर पर परिलक्षित होती है। यहां के लोकगीत नृत्य केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि लोक जीवन के अच्छे-बुरे अनुभवों एवं उनसे सीख लेने की प्रेरणा भी देते हैं।

विज्ञापन


हालांकि आधुनिक परिवेश के समयचक्र में पहाड़ों में बहुत सारे लोकगीत नृत्य विलुप्त हो गए हैं लेकिन बचे हुए लोकगीतों और नृत्यों की अपनी विशेष पहचान है। यहां लगभग दर्जन भर लोकगीतों की विधाएं आज भी अस्तित्व में हैं जिनमें चैती गीत चौंफला, चांछडी और झुमैलो सामूहिक रूप से किए जाने वाले गीत-नृत्य हैं।
विज्ञापन


चौंफला गीत
शरदकालीन त्योहारों में चांछडी और झुमैलों पहले ही शामिल थे लेकिन अब बासंती खुशी का विशेष गीत चौंफला भी इन त्योहारों में गाया जाने लगा है। झुमैंलो और चांछडी तथा चौंफला तीनों गीतों में पुरुष और महिलाओं की टोली बनाकर या एक ही घेरे में नृत्य किया जाता है। तीनों के नृत्य की शैली भिन्न है किंतु तीनों में श्रृंगार एवं भाव प्रधान होते है।
विज्ञापन
विज्ञापन


थडिया गीत
थडिया गीत भी इसी मौसम में गाया जाता है और ये गीत चौक तथा थडों (आंगन) में गाए जाते हैं इसीलिए इन्हें थडिया गीत कहा जाता है। इसके अलावा इन गीतों की विशिष्ट गायन एवं नृत्य शैली को भी थडिया कहा जाता है।

पंडावर्त शैली
पांडवों के साथ जुड़ी घटनाओं पर आधारित पंडावर्त शैली के लोक नृत्य वास्तव में नृत्य नाटिका के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। ये लोकनृत्य 20 लोकनाटयों में 32 तालों एवं 100 अलग-अलग स्वर लिपि में आबध्द होते हैं।
folk culture
मंडाण लोकनृत्य
टिहरी और उत्तरकाशी जिले में मंडाण लोकनृत्य ढोल-दमाऊं पर किया जाता है। इनको चार ताल में किया जाता है जिसमें देवी-देवताओं के आह्वान के गीत शामिल हैं। देव जात्रा, जात और शुभ कार्य शादी विवाह एवं चूड़ाक्रम आदि अवसरों पर इसकी प्रस्तुति की जाती है।

तांदि नृत्य
उत्तरकाशी तथा टिहरी जिले के जौनपुर क्षेत्र में तांदि नृत्य को खुशी के अवसरों पर और माघ के पूरे महीने में पेश किया जाता है तथा इस नृत्य के साथ में गाए जाने वाले गीत सामाजिक घटनाओं पर आधारित होते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से रचा जाता है।

झुमैला नृत्य
झुमैला सामूहिक नृत्य है जो बिना वाद्ययंत्रों के दीपावली और कार्तिक के महीने में रात भर गाया जाता है।

जागर और पंवाडे लोकनृत्य
ऐसी मान्यता है कि जागर और पंवाडे लोकनृत्य गीत देवी-देवताओं को नचवाने के लिए किए जाते हैं। देवी-देवताओं की कथाओं पर आधारित गायन और छंदबध्द कथावाचन (गाथा) के प्रस्तुतीकरण इस विधा का रोचक पक्ष है। गायन-वादन के लिए विशेष रूप से गुरु शिष्य परंपरा से प्रशिक्षित व्यक्ति ही आमंत्रित किए जाते हैं जिनका आज भी यही रोजगार है।


सरौं, छोलिया, पौंणा नृत्य
गढ़वाल में सरौं और छोलिया तथा पौंणा नृत्य प्रसिध्द हैं। तीनों की शैलियां अलग-अलग हैं लेकिन भाव वीर रस एवं शौर्य प्रधान सामग्री का प्रयोग तीनों में किया जाता है। सरौं नृत्य में ढोलवादक मुख्य किरदार में होते हैं जबकि छोलिया और पौंणा नृत्य में वादक और नर्तक के साझे करतब परिपूर्णता प्रदान करते हैं।

इन नृत्यों में सतरंगी पोशाक, ढोल-दमाऊं, नगाड़े, झंकोरा तथा कैंसाल और रणसिंगा वाद्य यंत्र एवं ढाल-तलवार अनिवार्य है। इन नृत्य गीतों में पचास साठ कलाकार एक साथ शामिल होते हैं। वीरान किंतु सुरम्य पहाड़ी वादियों में जंगल में घास काटती गढ़वाली महिलाओं की अलग गायन शैली है। विरह वेदना से व्यथित अथवा उदास पर्वतीय नारी के मन की पीड़ा इन गीतों की स्वर लहरियों में फूट पड़ती है। बिना वादन और नृत्य के ये गीत आज भी गढ़वाल के दूर-दराज जंगलों में घसियारियों द्वारा गाए जाते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed