अब खुलेगा कैलाश मानसरोवर क्षेत्र में बदलाव का राज, भारत-चीन और नेपाल ने तैयार की रणनीति
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पवित्र कैलाश भूक्षेत्र के संरक्षण की दिशा में चल रही परियोजना के तहत भारत ने 40 जियो मैप तैयार कर लिए हैं। ‘कैलाश भूक्षेत्र संरक्षण एवं विकास पहल परियोजना’ में नेपाल और चीन भी सहभागी हैं। मैप बनाने का काम उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) ने सैटेलाइट के माध्यम से पूरा किया है।
इन मैप से क्षेत्र में बड़े परिवर्तन का खाका तैयार हो गया है। भारत, चीन और नेपाल की संयुक्त संस्था आईसीमोड के तहत वर्ष 2013 से यह परियोजना शुरू हुई थी। 20 वर्ष की इस परियोजना का मकसद हिमालयी क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता, स्थानीय समुदायों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को पुख्ता करने के अलावा लोगों के आजीविका के साधन बढ़ाना है।
यह संस्थाएं भी कर रहीं काम
भारत में इस परियोजना की जिम्मेदारी कई संस्थाएं संभाल रही हैं, जिनमें से यूसैक भी एक है। यूसैक ने सैटेलाइट के माध्यम से भारत के हिस्से में आने वाली सात हजार किलोमीटर कैलाश भूक्षेत्र की जियो मैपिंग पूरी कर ली। इस मैपिंग के तहत 40 नक्शे बनाए गए हैं। इनमें इस क्षेत्र में 1976 से आ रहे बदलाव का शोधपरक अध्ययन किया गया है।
क्षेत्र के लोगों में मौसम से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि तीनों देशों में कुल 31 हजार वर्ग किलोमीटर कैलाश भूक्षेत्र है। इसमें से 14 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र नेपाल में, 10 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन में और सात हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भारत में है।
भारत में इस योजना में पिथौरागढ़ और बागेश्वर के सीमांत इलाके पर फोकस किया गया है। उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम के तहत इन देशों के सीमावर्ती इलाकों के बच्चे एक दूसरे देश की संस्कृति और खानपान को समझ रहे हैं। यह इलाका हिंदुओं, सिखों, बौद्धों ,बान आदि लोगों को लिए पवित्र माना गया है।
यह संस्थाएं भी कर रहीं काम
योजना में यूसैक के अलावा गोविंद बल्लभ पंत पर्यावरण संस्थान, भारतीय वन्य जीव संस्थान, उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड, वन विभाग और सरकारी संस्था चिया भी काम कर रही है।