फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   ima building

दून को गौरवांवित करता है आईएमए

Wed, 07 Aug 2013 12:38 PM IST
देहरादून/इंटरनेट डेस्क
देहरादून/इंटरनेट डेस्क Updated Wed, 07 Aug 2013 12:38 PM IST
विज्ञापन
ima building

इंडियन मिलिट्री एकेडमी कैंपस में भारतीय सेना के आधुनिक और नवीनतम गोला बारूद प्रदर्शित किए गए हैं। इसके साथ ही

विज्ञापन
यहां कई हथियारों से संबंधित विडियो क्लिप भी रखी गईं हैं। यहां मौजूद वॉर गैलेरी आईएमए के एक प्रमुख हिस्से के रूप में मानी जाती है। आईएमए से हर साल सैकड़ों युवा ऑफिसर पास आउट होते हैं। भारतीय सैन्य एकेडमी सुरक्षा की नजर से बेहद ही सेंसेटिव है।

आर्किटेक्टः
इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएमए) की विशेषताओं में से एक है इसके चेटवुड भवन की निर्माण शैली। 1930 में निर्मित इस भवन का डिजाइन आरटी रसेल ने तैयार किया था। यह भवन अपने आप में औपनिवेशिक और शुद्ध ब्रिटिश शैली का अनोखा उदाहरण है। इसके गलियारे काफी खुले और लंबे हैं। केंद्र में स्थित घंटाघर के साथ इसकी एकल छत है।

साथ ही ड्रिल स्क्वायर, भवन के सामने है जो इसे एक तरह की पवित्रता प्रदान करने के साथ-साथ सैन्य संस्थान जैसी फिजा भी उपलब्ध कराता है। तत्कालीन सरकार ने देहरादून के उस वक्त के रेलवे कॉलेज की भूसंपत्ति को एकेडमी के लिए उपार्जित किया, चूंकि इसकी इमारत और इसका विशाल परिसर, दोनों ही एकेडमी की स्थापना के सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए काफी उपयुक्त थे।
विज्ञापन


एकेडमी का विस्तार करने के लिए, अधिक ज़मीन खरीद कर, उस पर बहुत सारी अस्थायी इमारतें बनायी गयीं, जिन्हें आज तक इस्तेमाल किया जा रहा है. आवास के लिए पहले-पहल बनाए दो ब्लॉक्स को, पहले दो कमांडेंट्स- ब्रिगेडियर कॉलिंस और किंग्सले के नाम दिए गए।
विज्ञापन
विज्ञापन


इतिहासः
प्रिंस ऑफ वेल्स ने इंग्लैंड के सैंडहर्स्ट के रोयल मिलिट्री ऐकडमी में प्रशिक्षण के लिए जाने वाले भारतीयों के लिए भारत में ही एक मिलिट्री एकेडमी खोलने का निर्णय लिया और वर्ष 1922 में देहरादून में इंडियन मिलिट्री कॉलेज की स्थापना की। शुरुआत में मॉन्टेग-चेम्सफोर्ड रिफॉर्म्स ने प्रशिक्षण के लिए सैंडहर्स्ट भेजे जाने वाले दल से दस भारतीयों को तैयार किया।

बाद में 1930 में लंदन में हुए राउंड टेबल कांफ्रेंस में इस बात की सिफारिश की गई कि सैंडहर्स्ट के जैसे ही एक स्कूल के भारतीय रूप की स्थापना की जाए। इस काम को अंजाम देने के लिए, ब्रिटिश इंडिया सरकार ने, फील्ड मार्शल सर फिलिप शेत्वुड नामक तत्कालीन भारतीय कमांडर-इन-चीफ की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। जुलाई 1931 में, समिति ने यह सिफारिश की कि एक सत्र जिसकी अवधि छ: महीने थी, में चालीस प्रवेशकों के प्रशिक्षण के लिए एक अकादमी की स्थापना की जाय। जबकि प्रवेशकों की संख्या का विभाजन समिति ने कुछ इस प्रकार किया था कि एकेडमी में 15 प्रत्यक्ष प्रवेशक, 15 प्रवेशक नोवगांव के किचनर कॉलेज के माध्यम से और बाकी 10 रजवाड़ों को शामिल किए जाएं।

एकेडमी का शुभारंभः
1 अक्टूबर 1932 को, 40 जेंटलमैन कैडेट्स की प्रविष्टि के साथ, एकेडमी को कार्यात्मक रूप दिया गया। ब्रिगेडियर एल.पी. कॉलिन्स, एकेडमी के पहले कमांडेंट बने। कोर्स के पहले दल के कैडेट्स में सैम माणेकशॉ, स्मिथ डून और मूसा खान जैसे लोग शामिल थे जो कि आगे चलकर अपने-अपने देश अर्थात् भारत, बर्मा और पाकिस्तान की सेनाओं के प्रमुख बने। इस कोर्स का नाम पायोनियर्स रखा गया।

एकेडमी का औपचारिक उद्घाटन, पहले सत्र के अंत में 10 दिसंबर 1932 को किया गया। अकादमी का उद्घाटन तत्कालीन भारतीय कमांडर-इन-चीफ़ फील्ड मार्शल सर फिलिप शेत्वुड बैरोनेट ने किया। एकेडमी के मुख्य भवन और प्रमुख सभा-भवन को इन्हीं का नाम दिया गया है। उद्घाटन के अवसर पर सर फिलिप शेत्वुड द्वारा दिया गया भाषण ख़ास था, जो उसी सभा-भवन में दिया गया था जिसे आज भी उन्हीं के नाम से सुशोभित किया गया है। उनके भाषण के एक परिच्छेद को एकेडमी के सिद्धांत के रूप में अपनाया गया है।

यह परिच्छेद है - "हर बार और हमेशा, अपने देश की सुरक्षा, सम्मान और कल्याण के हित में काम करना आपका सबसे पहला कर्त्तव्य है। उसके बाद, अपने अधिपत्य में काम कर रहे व्यक्तियों के सम्मान, कल्याण और सुख-सुविधा का ख्याल रखना और सबसे अंत में, हर बार और हमेशा, अपने ख़ुद के आराम, सुख-सुविधा और सुरक्षा पर ध्यान देना" यह वाक्य शेत्वुड के 'आदर्श-वाक्य' माने जाते हैं, और इंडियन मिलिट्री एकेडमी में सफलता पाकर आगे बढ़ने वाले सभी अधिकारियों के आदर्श भी यही होते हैं।

1932 से स्वतंत्रता तकः
1934 में, कैडेट्स के पहले दल के उत्तीर्ण होने से पहले, भारत के वाइसरॉय, लॉर्ड विलिंग्डन ने, राजा की ओर से एकेडमी को ध्वज प्रदान किया। परेड की कमान अंडर-ऑफिसर जीसी स्मिथ डून ने संभाली। विश्व युद्ध छिड़ने के बाद, एकेडमी में प्रवेश पाने वालों की संख्या और उनकी श्रेणियों की संख्या में काफी वृद्धि हुई। दिसंबर 1934 और मई 1941 के बीच, 16 दल नियमित कोर्स उत्तीर्ण कर चुके थे, पर केवल 524 जेंटलमैन कैडेट्स को सेना में भर्ती किया गया, जबकि अगस्त 1941 से जनवरी 1946 के दौरान 3,887 कैडेट्स की भर्ती हुई।

IMAलड़ाई के बाद का पहला नियमित कोर्स 25 फरवरी 1946 को शुरू किया गया। आज़ादी के बाद के पहले भारतीय कमांडेंट ब्रिगेडियर ठाकुर महादेव सिंह बने थे। मई 1947 में, पंडित जवाहर लाल नेहरू और सरदार बल्लभभाई पटेल ने एकेडमी का दौरा किया। आज़ादी के समय, एकेडमी की जंगम-संपत्ति को भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित किया गया। इसमें जो जेंटलमैन कैडेट्स पाकिस्तान जाना चाहते थे, उन्होंने 14 अक्टूबर 1947 की रात को एकेडमी छोड़ दी। पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों की पहली दो पीढ़ियां इंडियन मिलिट्री एकेडमी की ही देन थीं।

1947 से रजत जयंती तक का सफरः
9 अक्टूबर 1948 को, एकेडमी ने, प्रथम भारतीय गवर्नर सी. राजगोपालाचारी का स्वागत किया और 9 दिसंबर को भारत के प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने विश्वविद्यालय के प्रथम ग्रेज्युएट कोर्स उत्तीर्ण करने वाले कैडेट्स की 'पासिंग आउट परेड' का मुआयना कर सलामी ली।

दिसंबर 1954 में, जॉइंट सर्विसेज विंग खडकवासला के एक सम्पूर्ण नवीन परिसर में स्थानांतरित हो गया और इसके साथ इसका नाम, निर्माण चिह्न और कमांडेंट भी गया। इंडियन मिलिट्री एकेडमी ने (तब मिलिट्री कॉलेज नाम दिया गया) अपनी असली पहचान और भूमिका को फिर से प्राप्त किया।

ब्रिगेडियर रणधीर सिंह ने कमांडेंट का पदभार संभाला। 1956 के अंत में, इंडियन मिलिट्री एकेडमी की कमान सैंडहर्स्ट-प्रशिक्षित अधिकारियों के हाथों से आईएमए प्रशिक्षित अधिकारियों के हाथों में आ गई, जब ब्रिगेडियर एम.एम. खन्ना, एमवीसी ने ब्रिगेडियर रणधीर सिंह का पदभार संभाला। 10 दिसंबर 1957 को मिलिट्री कॉलेज ने अपनी रजत जयंती मनाई, जहां बड़ी संख्या में प्रतिष्ठित दिग्गजों ने भाग लिया।

इंडियन मिलिट्री एकेडमीः
1960 में, मिलिट्री कॉलेज को फिर से इंडियन मिलिट्री एकेडमी नाम दिया गया. 10 दिसंबर 1962 को भारत गणराज्य के द्वितीय राष्ट्रपति, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इंडियन मिलिट्री एकेडमी को नया ध्वज प्रदान किया। 1963 में, कमांडेंट के पद को फिर से उन्नत कर मेजर जनरल का पद बना दिया गया और इस पदभार को मेजर जनरल एस.सी. पंडित ने संभाला।

1963 में चीनी आक्रमण के कारण नियमित पाठ्यक्रमों के प्रशिक्षण की अवधि में कटौती की गई और आपातकालीन पाठ्यक्रम की शुरुआत की गई। रंघरवाला क्षेत्र में और टोंस नदी के किनारे नए ठिकाने का निर्माण किया गया। अगस्त 1964 में, आपातकालीन पाठ्यक्रमों को बंद कर दिया गया और नियमित पाठ्यक्रमों को फिर से शुरू किया गया.

अंतिम आपातकालीन पाठ्यक्रम का परिणाम 1 नवम्बर 1964 को निकला। 1974 में, आईएमए के नियमित कोर्स में प्रवेश पाने के लिए शैक्षणिक योग्यता के स्तर को बढ़ाकर विश्वविद्यालय स्तर की डिग्री कर दिया गया, और डायरेक्ट एन्ट्री जेंटलमेन कैडेट्स के लिए प्रशिक्षण की अवधि को दो साल से घटाकर डेढ़ साल कर दिया गया।


आईएमए की चार बटालियनों के नाम थे - करियप्पा बटालियन, थिमइया बटालियन, माणेकशॉ बटालियन और भगत बटालियन। हर बटालियन के साथ दो कम्पनियां जुड़ी हुई थीं। ऐतिहासिक रूप से देखा जाय तो, इंडियन मिलिट्री एकेडमी आईएमए एक आदर्श सैन्य संस्था है और भारतीय उपमहाद्वीप में, अपने इलाके की पहली प्रशिक्षण संस्था है। 01.10.2007 को आईएमए ने अपनी स्थापना के 75 वर्ष पूरे किये.

संरचनाः
कैडेट्स को चार प्रशिक्षण बटालियनों में बांटा गया है और हर बटालियन की 3 या 4 कम्पनियां होती है और कंपनियों की संख्या कुल मिलाकर 15 होती है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed