हिमालयन कॉन्क्लेवः केंद्रीय पोषित कृषि योजनाओं में ज्यादा छूट देने की होगी वकालत
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पर्वतीय क्षेत्रों की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण फसलों की उत्पादकता बढ़ाना किसानों के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। जिससे देश के 11 हिमालयी राज्यों को पहाड़ों के हिसाब से अलग कृषि नीति की दरकार है। आज मसूरी में होने वाली हिमालयी राज्यों की बैठक में कृषि नीति का मुद्दा उठेगा। हिमालयी राज्य केंद्रीय पोषित कृषि योजनाओं में किसानों को ज्यादा छूट और सुविधाएं देने की वकालत कर रहे हैं।
खेती के लिहाज से मैदानी और पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थिति में काफी अंतर होने के बावजूद भी कृषि नीति समान है। हिमालयी राज्यों की मांग है कि पहाड़ों में खेती करने में किसानों के सामने जिस तरह की चुनौतियां हैं, नीति भी उसी के आधार पर बनाई जानी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में छोटे-छोटे बिखरे हुए खेत होने से फसलों की पैदावार में लागत ज्यादा और उत्पादन कम हो रहा है। मैदानी क्षेत्रों की तुलना में पहाड़ों में फसलों की उत्पादकता आधे से भी कम है। जिससे पर्वतीय राज्यों के लिए केंद्र को अलग से कृषि नीति बनानी चाहिए।
जंगली जानवरों से फसलों को बचाने के लिए पहाड़ों में फेंसिंग करना संभव नहीं है। रसायनिक खादों पर किसानों को 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है। लेकिन हिमालयी राज्य जैविक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। जिससे जैविक खेती करने पर भी किसानों को छूट का प्रावधान होना चाहिए। क्योंकि जैविक खेती करने वाला किसान रसायनिक खादों का इस्तेमाल नहीं करता है। परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत 20 हेक्टेयर पर 10 लाख देने का प्रावधान किया है। जबकि पहाड़ों के लिए इसके मानक अलग होने चाहिए। जंगली जानवरों और ओलावृष्टि से फसलों को होने वाले नुकसान को फसल बीमा योजना में शामिल नहीं किया गया है। रविवार को हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में अलग कृषि नीति के मुद्दे पर चर्चा हो सकती है।
पहाड़ों में पानी तो है, सिंचाई की सुविधा नहीं
प्रदेश में कुल कृषि क्षेत्र का 3.30 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही सिंचाई की सुविधा है। इसमें पर्वतीय क्षेत्रों में मात्र 43250 हेक्टेयर (13.11 प्रतिशत) सिंचित क्षेत्र में शामिल है। पहाड़ों में पानी होने के बावजूद भी किसानों को सिंचाई की सुविधा नहीं है। असिंचित क्षेत्र होने के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में किसानों को बारिश पर निर्भर रहना पड़ता है। सिंचाई की सुविधा के अभाव में फसलों की उत्पादकता कम है। हिमालयी राज्य ड्रिप सिंचाई योजना में ज्यादा सब्सिडी की मांग कर रहे हैं।
मैदानी और पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थिति बिल्कुल भिन्न है। पहाड़ों में खेती करने में कई तरह की चुनौतियां हैं। इसके आधार पर हिमालयी राज्यों के लिए अलग नीति बनाई जानी चाहिए। हाल ही में देश के कृषि मंत्रियों की बैठक में भी इस मुद्दे को उठाया गया था। अलग कृषि नीति बनने से पहाड़ों में किसानों को ज्यादा सुविधाएं मिल सकेगी।
-सुबोध उनियाल, कृषि मंत्री