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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Himalaya Diwas 2022 : Himalaya Sankalp Abhiyan samvad program in Amar Ujala office dehradun

Save Himalaya: वैज्ञानिकों व जनता के सुझावों से तैयार होगा हिमालय चार्टर, संवाद में प्रबुद्धजनो ने बनाई राय

Fri, 09 Sep 2022 12:10 AM IST
अलका त्यागी अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 09 Sep 2022 12:10 AM IST
सार

हिमालय बचाओ अभियान के तहत अमर उजाला पिछले कई वर्षों से सामाजिक दायित्वों के निर्वहन करते हुए अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा है। इस कड़ी में आठ सितंबर को हिमालय एक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।

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Himalaya Diwas 2022 : Himalaya Sankalp Abhiyan samvad program in Amar Ujala office dehradun
हिमालय बचाओ अभियान के तहत अमर उजाला कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमर उजाला की पहल पर वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों व जनता के सुझावों से हिमालय चार्टर तैयार किया जाएगा। 13वें हिमालय दिवस के उपलक्ष्य में शुरू हुई हिमालय बचाओ अभियान संवाद शृंखला के पहले संवाद में विज्ञानियों, पर्यावरणविदों, प्रगतिशील किसानों और सामाजिक चिंतकों व कार्यकर्ताओं ने एक सुर में यह निर्णय लिया। 

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अमर उजाला के पटेलनगर स्थित कार्यालय में बृहस्पतिवार को आयोजित संवाद में तय हुआ कि हिमालय के पर्यावरणीय, आर्थिक, सामाजिक सरोकारों के संरक्षण के लिए 10 बिंदुओं का एक चार्टर बनाया जाएगा। इसे तैयार करने के लिए आने वाले दिनों में अमर उजाला केंद्र और राज्य सरकार के उन सभी ख्यातिलब्ध संस्थानों के प्रतिनिधियों के साथ एक संगोष्ठी आयोजित करेगा।
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इनमें केंद्रीय मृदा एवं जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, भारतीय वन्यजीव संस्थान, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण विभाग, वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान, वन अनुसंधान संस्थान आदि के वैज्ञानिक भाग लेंगे। 
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Save Himalaya: पर्यावरण की रक्षा करने वाले पेड़ों को मिलेगा सुरक्षा कवच, हिमालय बचाओ अभियान में लिया संकल्प


उपयोगी सुझावों को सरकार की नीतियों में शामिल करेंगे : सुबोध

वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि अमर उजाला के संवाद कार्यक्रमों से जो हिमालय और राज्य हित के लिए उपयोगी सुझाव आएंगे, उन्हें सरकार की नीतियों में शामिल किया जाएगा। आने वाले दिनों वह स्वयं केंद्रीय संस्थानों के साथ एक बड़ी बैठक करेंगे, ताकि उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों का उपयोग हिमालय और जनहित में किया जा सके। उन्होंने कहा कि राज्य के वनों को संरक्षण के लिए वह 100 बड़े बदलाव करने जा रहे है।

साल भर चलेगा अभियान

अमर उजाला के संवाद में यह तय किया गया कि यह पहल हिमालय दिवस तक सीमित नहीं रहेगी। संवाद के इस सिलसिले को साल भर जारी रखा जाएगा। समय-समय पर संगोष्ठियों, कार्यशालाओं और पर्वतीय क्षेत्रों में विभिन्न गतिविधियों के संचालन होंगे।

जैव विविधता बचानी है तो चीड़ से मुक्ति पानी होगी

हिमालयी क्षेत्रों की जैव विविधता बचानी है तो चीड़ के जंगलों से मुक्ति पानी होगी। बांज के जंगलों में चीड़ तेजी से घुसपैठ कर रहा है। जिससे जैव विविधता खत्म हो रही है। मैती आंदोलन के प्रणेता पद्मश्री कल्याण रावत ने हिमालय बचाओ दिवस संवाद में यह बात कही।

पर्यावरणविद कल्याण रावत ने कहा कि चीड़ के जंगलों का प्रबंधन करने की आवश्यकता है। चीड़ से प्राकृतिक जलस्रोत सूख रहे हैं। जिसके कारण खेती भी बिना पानी के बंजर होती जा रही है। सरकार को चाहिए कि चीड़ के जंगल को खत्म कर इसकी जगह बांज के जंगल को बढ़ावा दे। चीड़ के पेड़ों को काट कर स्थानीय लोगों को मकान बनाने के लिए उपलब्ध कराया जाए। साथ ही उन्हें बांज के जंगल लगाने के लिए प्रोत्साहित करें।

उन्होंने सुझाव दिया कि दो हजार फीट की ऊंचाई से ऊपर के क्षेत्रों में सीमेंट से बनने वाली मकान की छत पर रोक लगनी चाहिए। यह भूकंप की दृष्टि से सुरक्षित नहीं है। सीमेंट के लेंटर की जगह लकड़ी की छत वाले मकानों को बढ़ावा देने की नीति बनाई जाए। उन्होंने कहा कि बुग्यालों का संरक्षण किया जाना चाहिए।

खरपतवार काला बांज, गाजर घास, लैंटाना सबसे बड़ी समस्या बन रहे हैं। इससे पशुचारे का संकट होने के साथ ही खेत भी बंजर हो रहे हैं। रावत के मुताबिक जैव विविधता प्रभावित होने से मानव-वन्य जीव संघर्ष बढ़ रहा है। वन्य जीव रिहायशी इलाकों में घुस रहे हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए सरकार को जल, जंगल और जमीन के प्रबंधन की रणनीति पर काम करने की जरूरत है।

पर्यावरण के मुद्दों को अपने घोषणापत्र में महत्व नहीं देते राजनीतिक दल: प्रो. रावत

नैनीताल से परिचर्चा में वर्चुअली जुड़े इतिहासकार व पर्यावरणविद प्रो. अजय रावत ने कहा कि हिमालय के प्रति कोई भी सरकार कभी गंभीर नहीं रही। दुर्भाग्य से कोई भी राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणापत्र में पर्यावरण के मुद्दों को महत्व नहीं देता है। यही कारण है कि यहां अधिकतर विकास योजनाएं बगैर किसी जांच-पड़ताल के बना दी जाती हैं। इससे फायदा कम, नुकसान अधिक होता है। उन्होंने वर्ष 2019-20 में पर्यटन को बढ़ावा देने वाली सरकार की ऐसी ही योजना का उदाहरण दिया, जिसमें सरकार नैनीताल में सी प्लेन उतारने की बात कही थी। मामला हाईकोर्ट तक गया। विरोध होने पर आखिरकार सरकार को इस योजना को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा। 

प्रो. रावत ने कहा कि हिमालय के पर्यावरण और उसके महत्व को कभी भी नहीं समझा गया। गंगा-यमुना के इस मैदान में देश की 40 फीसदी से अधिक आबादी रहती है। गंगा यमुना के मैदान की उर्वरता का आधार भी उत्तराखंड से बहकर जाने वाली मिट्टी है। उन्होंने कहा कि 21 नवंबर 2021 को सरकार ने वनों की परिभाषा बदलने की बात कही है। यदि यह लागू हुई तो इससे उत्तराखंड में 10 हजार वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र कम हो जाएगा। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के लिए माइनिंग (खनन) सबसे बड़ा खतरा है। खनन के कारण खेती खत्म हो रही है। जमीन की उर्वरता घट रही है। भूजल स्तर घट रहा है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो रही है। सबसे अधिक नुकसान बागेश्वर में देखा जा सकता है, जहां वर्ष 2011 में खड़िया की तीस खान थी, जो अब बढ़कर 107 हो चुकी हैं। अभी कुछ और खनन पट्टों को अनुमति देने की बात चल रही है।

मैदान से हटकर बनाई जाएं पहाड़ की योजनाएं: राधा बहन 

गांधीवादी विचारक राधा बहन ने कहा कि सरकारों को पहाड़ों के लिए विकास की नीति बनाते समय मैदान से हटकर सोचना होगा। दोनों के विकास की समान नीति नहीं हो सकती है। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो न पहाड़ सुरक्षित रहेंगे और न ही हिमालय। विकास के नाम पर सड़क परियोजनाओं के जरिये पहाड़ की छाती छलनी की जा रही है। यह विकास कहीं न कहीं हमें विनाश की ओर ले जा रहा हैं। प्राकृतिक जल स्रोत सूख रहे हैं, नदियां दम तोड़ रही हैं। पहाड़ भीतर ही भीतर खोखले हो रहे हैं। जंगल धीरे-धीरे सिमटते जा रहे हैं। क्या यह सब काफी नहीं है समझने के लिए कि हिमालय घायल हो रहा है। उसका रोना और सिसकना किसी को नजर नहीं आ रहा है। इसकी वजह यह है कि हम स्वार्थ में इतने अंधे हो चुके हैं कि हमें हिमालय या प्रकृति की कोई परवाह ही नहीं है। 

राधा बहन ने कहा कि उत्तराखंड के विकास के लिए न तो हमारी सरकारों की अवधारणा सही है, न ही पीढ़ियों से यहां रहने वाले आमजन की। इन दिनों गांव तक मोटर रोड पहुंचने को ही हमने सबसे बड़ा विकास मान लिया है। हमने कभी यह गणित नहीं लगाया कि उस मोटर रोड के लिए हम कितनी बहुमूल्य वनस्पतियों, नदियों, जलस्रोतों और कृषि भूमि की भेंट चढ़ा रहे हैं। राधा बहन ने प्रदेश में बड़े बांधों की जगह छोटे बांध बनाए जाने की परैवी की। उन्होंने कहा कि इससे रोजगार पैदा हो सकता है, जिससे स्थानीय युवाओं को जोड़ा जाए।

गंगोत्री में ऑल वेदर रोड का रुख बदलकर बचा सकते हैं दो लाख पेड़: सुरेश भाई 

परिचर्चा में वर्चुअली जुड़े पर्यावरणविद सुरेश भाई ने कहा कि विकास के नाम पर देहरादून सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में पेड़ काटे जा रहे हैं। इससे हिमालय बचाने की मुहिम को बड़ा धक्का लगा है। उन्होंने कहा कि भागीरथी ईको सेंसिटिव जोन में ऑल वेदर रोड के तहत गंगोत्री तक 10 मीटर चौड़ी सड़क बनाई जा रही है। यदि केंद्र सरकार इसका रुख बदल दे तो दो लाख देवदार और अन्य प्रजातियों के पेड़ों को कटने से बचाया जा सकता है। गंगोत्री क्षेत्र में करीब 30 किमी के दायरे में देवदार के हरे जंगल हैं। सुखी गांव से ही मौजूदा सड़क को यथावत रखते हुए चौड़ीकरण किया जा सकता है। इससे आगे जसपुर गांव से बगोरी, हर्षिल, मुखवा से जांगला तक ऑल वेदर रोड बनाई जा सकती है।

इस क्षेत्र में बहुत कम पेड़ हैं और अधिकांश जगह पर मोटर सड़क पहले से बनी है। यदि केंद्रीय सड़क और राजमार्ग मंत्रालय इसकी स्वीकृति दे तो सुखी बैंड से हर्षिल होते हुए जांगला तक हजारों देवदार के पेड़ों को बचाया जा सकता है। इसके अलावा गंगोत्री जाने वाले यात्रियों को भागीरथी के दोनों ओर से जाने-आने की सुविधा मिलेगी। उन्होंने कहा कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी पहाड़ों में हरित निर्माण तकनीक के अनुसार सड़कों के चौड़ीकरण की बात कर रहे हैं, लेकिन उनके दावों के विपरीत ऑल वेदर रोड में सभी निर्माण कार्य किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिमालय दिवस का इस समय का यह सबसे बड़ा मुद्दा है। जिसके आधार पर हम जल, जंगल, जमीन के अधिकारों को जनता को सौंपने और एक मजबूत हिमालय नीति की मांग करते हैं।

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