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हिमालय चाहता है संतुलित विकास

Tue, 09 Sep 2014 10:46 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 09 Sep 2014 10:46 AM IST
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himalaya day special story

हिमालय ने दिवस के रूप में पिछले पांच वर्षों से स्वयं को स्थापित करने का प्रयास किया है। इस संवेदनशील प्रकृति की अलौकिक देन को हमने कई तरह से नकारा था। इसकी चिन्ता टुकड़ों-टुकड़ों में की, परन्तु सामूहिक अभिव्यक्ति का कोई और रास्ता नहीं था।

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हिमालय के लिए उठे चिंता के स्वर

यह कहना है हैस्को के संस्थापक निदेशक डॉ. अनिल प्रकाश जोशी का। उनका कहना है कि हिमालय दिवस की सामूहिक स्वीकार्यता है। इसे हिमालय के निवासियों ने ही नहीं मनाया बल्कि देश के दूसरे कोनों में भी चिंता के स्वर उठे। आमजन की भागीदारी के अलावा समाज के सभी वर्गों ने इसके महत्व को स्वीकारा है।
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चाहे सरकारी या गैर सरकारी शोध संस्थान हों या सामाजिक संगठन, सबने इस यज्ञ में हाथ जोड़े । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस दिवस के बहाने ही सही, सबने इससे जुड़ी बहस में हिस्सा लिया।
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आपदाओं की बाढ़, अप्रासांगिक उद्योगों की भीड़ और असंवेदनशील योजनाएं आज चर्चा का विषय हैं। सरकारों और नीतिकारों के भी सोचने का समय आ चुका है। हिमालय का एकतरफा आर्थिक विकास बड़े विनाश का कारण बनेगा। हिमालय स्वयं संतुलित है इसलिए संतुलित विकास का पक्षधर है। इसके सरल, मूक व्यवहार को हल्के में ना लिया जाय।

रास्ता एक ही है । हर वर्ष यहां के पर्यावरणीय हालातों की भी चर्चा करनी होगी। कल त्रासदी से उत्तराखंड पीड़ित था आज जम्मू-कश्मीर बाढ़ की त्राहि-त्राहि झेल रहा है। आने वाले कल में किसी और राज्य की बारी आने वाली है।

आखिर कब तक हम इन आपदाओं के मूल कारणों की अनदेखी करते रहेंगे। जितनी ऊर्जा और धन हम आपदा के बाद खर्च करते हैं उससे बहुत कम में ही हम सुनियोजित होकर इनसे पल्ला छुड़ा सकते हैं। पर सरकार की प्राथमिकता पारिस्थितिकी नहीं होती।

इसकी बात ही आपदा के बाद होती है। बाद में फिर सब ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। हिमालय को जीवित समझना होगा वर्ना हम सामूहिक संकट में घिर जाएंगे। मनुष्य भले ही कुछ ना करे, प्रकृति अपना काम जरूर करेगी। उस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं।

जल, जंगल, जमीन के रख-रखाव से सुरक्षित रहेगा हिमालय
गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट ने अनियोजित विकास ही हिमालय के लिए घातक सिद्ध हो रहा है।

हमें सड़कों की जरुरत तो है, लेकिन इसके निर्माण में पर्यावरण पहलुओं का ध्यान नहीं रखा जा रहा है। श्री भट्ट ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में जल, जंगल, जमीन के रख-रखाव पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। जिससे हिमालय क्षेत्र को मजबूती मिल सकेगी।

यह इसलिए जरुरी है कि गंगोत्री से गंगा सागर तक गंगा का बेसन हिमालय से प्रभावित होता है। आज ग्लेशियरों के सिकुड़ने पर तो अध्ययन हो रहा है, लेकिन इससे ट्री लाइन, फसल चक्र, जीव-जंतु और सिंचाई व्यवस्था पर क्या कुप्रभाव पड़ रहा है, इस पर अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया है, जबकि यह ज्वलंत समस्या उभर कर सामने आ रही है।

भट्ट ने कहा कि हिमालय से जुडे़ देशों भारत, नेपाल, भूटान और चीन को एक मोर्चा बनाकर हिमालय संरक्षण व संवर्द्धन पर ठोस कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्ष 2013 में केदारनाथ जलप्रलय घटित हुई, लेकिन इसका तुलनात्मक अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है।

भारत के मौसम का नियंत्रक है हिमालय

यह देखा जाना बेहद जरुरी है कि इस प्रकार की अतिवृष्टि पहले हुई हो तो उस समय वातावरण पर इसका क्या असर रहा था। हिमालय क्षेत्र भारत के मौसम का नियंत्रक भी है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप बढ़ता है तो मौसम में भी भारी बदलाव देखने को मिलता है।

हिमालय के बारे में वर्तमान तक का अध्ययन पूर्ण नहीं माना जा सकता है। हिमालय क्षेत्र में पिछले दस सालों में क्या बदलाव आया है, इसका अध्ययन होना बेहद जरुरी है। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में पता चला कि हिमालय क्षेत्र में करीब 975 ग्लेशियर मौजूद हैं।

जबकि इसरो हिमालय क्षेत्र में 23 हजार ग्लेशियर होने की बात कहता है। यह भिन्नता हिमालय के बारे में पूर्ण जानकारी न होने की बात स्पष्ट करता है। हिमालय क्षेत्र के विकास के लिए इको डेबलपमेंट पर जोर दिए जाने की आवश्यकता है।


हिमालय क्षेत्र में छेड़छाड़ से भूस्खलन, भू-धंसाव जैसे प्रभावों के साथ नदियों का तल भी तेजी से उठ रहा है, जो भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। इसके लिए नदियों के संरक्षण के लिए वृहद कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए।

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