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हाईकोर्ट के फैसले से मुश्किल में उत्तराखंड सरकार

Thu, 03 Jul 2014 02:11 AM IST
अजित सिंह राठी/अमर उजाला, देहरादून
अजित सिंह राठी/अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 03 Jul 2014 02:11 AM IST
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high court ask for sit to uttarakhand government

पुलिस विभाग की जिद उत्तराखंड सरकार के लिए मुसीबत बन गई है। रिजर्व फॉरेस्ट जमीन के मामले में उच्च न्यायालय का फैसला सरकार को असहज कर रहा है और तमाम विवाद हो जाने के बाद अब सरकार के रुख पर नजरें लगी है।

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यह मामला इतना उलझ चुका है कि अब बगैर एसआईटी इसका समाधान होना मुश्किल नजर आ रहा है। उच्च न्यायालय का जोर भी इसी पर है।

रिजर्व फॉरेस्ट से पेड़ कटान के मामले में जब विभागीय अफसरों और कुछ ठेकेदारों के खिलाफ मुकदमा कायम हुआ था तब भी कई लोगों ने अंगुली उठाई थी।

उस समय भी उच्च न्यायालय ने पुलिस की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। और, इस मामले में एसआईटी के गठन का आदेश दिया था।

ग्रीन ट्रिब्यूनल में भी चल रहा है मामला

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उस समय शासन ने शपथपत्र दाखिल कर कहा कि डीजीपी से वरिष्ठ आईपीएस सूबे में नहीं है इसलिए एसआईटी का गठन नहीं किया जा सकता। इसी दौरान यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में चला गया।

मुख्य सचिव सुभाष कुमार ने ट्रिब्यूनल में दिए शपथपत्र में विवादित जमीन को रिजर्व फॉरेस्ट की बताते हुए सरकारी खाते में दर्ज करने की सूचना भी शपथपत्र में दी है।

ट्रिब्यूनल में तीन जुलाई को सुनवाई है। इसी को लेकर मामला घूम गया। सूत्र बताते हैं कि फॉरेस्ट के अफसरों व अन्य के खिलाफ चार्ज शीट कोर्ट में दाखिल करने की जल्दबाजी इसलिए की गई ताकि इसी चार्जशीट को ट्रिब्यूनल में दाखिल कर दिया जाएगा।

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डीजीपी को बचाने को पुलिस ने चला था दांव

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ट्रिब्यूनल में यह सुनवाई हो रही है कि रिजर्व फॉरेस्ट से पेड़ किसने काटे। बस, यहीं से पुलिसिया दिमाग ने काम शुरू किया। क्योंकि चार्जशीट में फारेस्ट के अफसर व अन्य दोषी हैं।

यही माना गया कि ग्रीन ट्रिब्यूनल में चार्जशीट दाखिल करने से डीजीपी बीएस सिद्धू का पक्ष मजबूत हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और उच्च न्यायालय के फैसले ने पुलिस की रणनीति को पलट दिया।

यदि इस मामले में एसआईटी का गठन हो गया तो भी पुलिस और उसके प्रदेश मुखिया के लिए दिक्कत खड़ी हो सकती है।

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इसी चार्जशीट को लेकर है लड़ाई

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सीजेएम कोर्ट में दाखिल जिस चार्जशीट पर उच्च न्यायालय ने रोक लगाई है, उसी को लेकर दारोगा निर्विकार भी बागी हुए।

उनका यही कहना है कि मैंने चार दिन में जो विवेचना की उस रिपोर्ट को चार्जशीट में शामिल नहीं किया। इससे पहले डिप्टी एसपी स्वतंत्र कुमार ने जो जांच की उसे भी विवेचना में शामिल नहीं किया गया।

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